आहार से आत्मसंयम तक
जैन दर्शन में मांसाहार, जमीकंद और उपवास का समग्र चिंतन - अहिंसा, स्वास्थ्य, पाप–पुण्य और आयुर्वेद के आलोक में
आहार से आत्मसंयम तक
जैन दर्शन में मांसाहार, जमीकंद और उपवास का समग्र चिंतन- अहिंसा, स्वास्थ्य, पाप–पुण्य और आयुर्वेद के आलोक में
जैन धर्म की आहार-व्यवस्था को यदि केवल “क्या खाना है और क्या नहीं खाना है” की सूची मान लिया जाए, तो उसके पीछे छिपे विशाल दर्शन को हम बहुत छोटा कर देंगे। मांसाहार का निषेध, जमीकंद का त्याग, रात्रिभोजन से विरति, नवकारसी–पोरसी जैसे दैनिक प्रत्याख्यान और अष्टमी–चतुर्दशी आदि पर्वतिथियों पर उपवास—ये सब मात्र पेट से संबंधित नियम नहीं हैं। इनके केन्द्र में मनुष्य की चेतना, करुणा, इन्द्रिय-संयम और कर्मों से मुक्त होने की प्रक्रिया है।
दूसरी ओर, इन सभी नियमों को केवल इस रूप में प्रस्तुत करना कि “प्राचीन आचार्यों को आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान की पूरी जानकारी थी और पाप–पुण्य की भाषा केवल सामान्य जनता को समझाने के लिए बनाई गई थी”—यह निष्कर्ष भी प्रमाणों से पूरी तरह समर्थित नहीं है।
अनेकांत की दृष्टि कहती है कि इन आहार-विधानों को तीन स्तरों पर समझा जाए—
- आध्यात्मिक स्तर पर—अहिंसा, संयम, संवर और निर्जरा।
- नैतिक स्तर पर—पाप से निवृत्ति, करुणा और उत्तरदायित्व।
- शारीरिक स्तर पर—मिताहार, स्वच्छता, पाचन और स्वास्थ्य-संरक्षण।
इनमें स्वास्थ्य महत्त्वपूर्ण है, लेकिन धर्म का अंतिम लक्ष्य केवल स्वस्थ शरीर प्राप्त करना नहीं है।
शरीर साधन है, साध्य नहीं
जैन दर्शन शरीर की उपेक्षा नहीं करता। अनगारधर्मामृत में कहा गया है कि धर्म-साधना के लिए शरीर की रक्षा भोजन, शयन और आवश्यक उपचार द्वारा की जानी चाहिए; लेकिन भोजन इतना और ऐसा हो कि इन्द्रियाँ हमारे नियंत्रण में रहें, हम इन्द्रियों के नियंत्रण में न चले जाएँ।
यही जैन दृष्टि का संतुलन है—
शरीर की रक्षा आवश्यक है, लेकिन शरीर के प्रति आसक्ति उचित नहीं है। भोजन साधना को चलाने के लिए हो, स्वाद की तृष्णा बढ़ाने के लिए नहीं।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि निरोग शरीर साधना का महत्त्वपूर्ण सहयोगी है, पर संवर–निर्जरा का “एकमात्र कारण” नहीं है। तत्त्वार्थसूत्र 9.2 संवर के कारणों में गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय और चारित्र को रखता है तथा 9.3 में तप को संवर और निर्जरा का प्रमुख कारण बताता है।
रोग को भी जैन दर्शन में बाईस परीषहों में गिना गया है। इसका अर्थ है कि रोग की स्थिति में भी समता, धैर्य, स्वाध्याय और कषाय-नियंत्रण द्वारा साधना संभव है। स्वस्थ शरीर साधना को सुगम बनाता है, लेकिन रोगी व्यक्ति के लिए आत्मकल्याण का मार्ग बंद नहीं हो जाता।
पाप और पुण्य—भय की भाषा नहीं, कर्म-विज्ञान है
जैन दर्शन में पाप और पुण्य केवल सामाजिक डर पैदा करने वाले शब्द नहीं हैं। ये कर्म-सिद्धान्त की पारिभाषिक अवधारणाएँ हैं।
जिस प्रवृत्ति में हिंसा, क्रूरता, लोभ, कपट, प्रमाद और असंयम हो, वह पापबन्ध का कारण बनती है। जिस प्रवृत्ति में दया, सेवा, संयम और शुभभाव हो, वह पुण्यबन्ध का कारण बन सकती है। किंतु जैन दर्शन इससे भी आगे जाता है—पुण्य भी कर्म है और मोक्ष के लिए अंततः पाप तथा पुण्य दोनों प्रकार के बन्धनों से ऊपर उठना है।
इसीलिए किसी पदार्थ का त्याग केवल बाहरी क्रिया नहीं है। उसके पीछे का भाव निर्णायक है।
मांस न खाना शरीर के लिए लाभकारी निर्णय हो सकता है; लेकिन यदि उसके पीछे जीवदया और अहिंसा का भाव है, तो उसका आध्यात्मिक मूल्य बढ़ जाता है। इसी प्रकार उपवास यदि अहंकार, प्रदर्शन या प्रतिस्पर्धा के लिए किया जाए तो भूखा रहना तो हुआ, लेकिन आवश्यक नहीं कि वह निर्जरा का शुद्ध तप भी बन गया हो।
जैन दर्शन में प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमने क्या खाया;
प्रश्न यह भी है कि खाते समय हमारी चेतना कैसी थी।
मांसाहार का निषेध—स्वास्थ्य से पहले अहिंसा
जैन श्रावकाचार परम्परा में मद्य, मांस और मधु का त्याग श्रावक के मूल गुणों में रखा गया है। पुरुषार्थसिद्ध्युपाय तथा सागारधर्मामृत में हिंसा से निवृत्त होने की इच्छा रखने वाले गृहस्थ के लिए मांस-त्याग को प्रारम्भिक आवश्यकताओं में माना गया है।
मांसाहार में सामान्यतः पंचेन्द्रिय जीव की हत्या, भय, वेदना और उसके शरीर को भोजन में बदलने की पूरी व्यवस्था जुड़ी होती है। पशु को मारने वाला, मरवाने वाला, खरीदने वाला, बेचने वाला और उपभोग द्वारा उस व्यवस्था को समर्थन देने वाला—इन सबकी नैतिक भागीदारी पर जैन दर्शन विचार करता है।
इसलिए जैन मांस-त्याग का सबसे प्रामाणिक आधार यह नहीं कि हर प्रकार का मांस प्रत्येक मनुष्य के लिए हर परिस्थिति में चिकित्सकीय रूप से विष है। उसका मूल आधार यह है कि—
अपने स्वाद और पोषण के लिए किसी भयभीत एवं संवेदनशील जीव का जीवन लेना अहिंसा के सिद्धान्त से असंगत है, विशेषतः तब जब पोषण के अहिंसक विकल्प उपलब्ध हों।
आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान भी पौध-प्रधान संतुलित भोजन के अनेक लाभ बताता है। दालों, साबुत अनाज, फलों, सब्जियों, मेवों और बीजों पर आधारित स्वस्थ भोजन हृदय रोग, मोटापा तथा टाइप-2 मधुमेह के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर एजेंसी ने प्रसंस्कृत मांस को कोलोरेक्टल कैंसर का कारण तथा लाल मांस को सम्भावित कैंसरकारक माना है।
लेकिन यहाँ ईमानदारी आवश्यक है। आधुनिक विज्ञान केवल स्वास्थ्य के आधार पर प्रत्येक मनुष्य के लिए हर प्रकार के मांस का पूर्ण निषेध घोषित नहीं करता। उसी प्रकार शास्त्रीय आयुर्वेद में भी विभिन्न मांसों और मांस-रस के चिकित्सकीय गुण बताए गए हैं।
इसलिए मांसाहार का पूर्ण त्याग मुख्यतः जैन धर्म की अहिंसक नैतिक घोषणा है; आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान उसके कुछ लाभों की पुष्टि कर सकता है, लेकिन जैन निषेध का सम्पूर्ण आधार स्वास्थ्य नहीं है।
जहाँ आयुर्वेद किसी पदार्थ की चिकित्सकीय उपयोगिता देखता है, वहीं जैन दर्शन उससे पहले यह प्रश्न पूछता है—
इस पदार्थ की प्राप्ति में कितनी हिंसा हुई और मेरे स्वाद के लिए किस जीव ने अपना जीवन खोया?
जमीकंद का त्याग—केवल पूरा पौधा उखड़ने का प्रश्न नहीं
सामान्यतः कहा जाता है कि आलू, प्याज, लहसुन, मूली, गाजर, अदरक, शकरकंद आदि निकालने में पूरा पौधा नष्ट हो जाता है; इसलिए जमीकंद निषिद्ध हैं। यह कारण उपयोगी है, लेकिन सम्पूर्ण आगमिक कारण नहीं है।
जैन जीव-विज्ञान में वनस्पति के दो महत्त्वपूर्ण भेद बताए गए हैं—
- प्रत्येक वनस्पतिकाय—जिस शरीर में एक जीव माना गया है।
- साधारण वनस्पतिकाय अथवा अनन्तकाय—जिस एक साधारण शरीर में अनन्त जीवों का आश्रय माना गया है।
मूलाचार की गाथाओं में मूल, कंद, स्कंध, बीज, अंकुर, पत्ते और फल आदि वनस्पतियों के प्रत्येक तथा अनन्तकाय—दोनों प्रकार सम्भव बताए गए हैं। इसलिए केवल यह कहना कि “जो जमीन के नीचे उगता है, वह अवश्य अनन्तकाय है”—शास्त्रीय विषय को कुछ अधिक सरल बना देना होगा। किसी वनस्पति की आगमिक श्रेणी उसके केवल जमीन के नीचे या ऊपर होने से नहीं, बल्कि उसके जीव-स्वरूप और परम्परागत आगमिक लक्षणों से निर्धारित होती है।
जमीकंद के निषेध के पीछे परम्परागत रूप से तीन विचार मिलते हैं—
- उसे निकालने में मूल सहित पौधे का जीवन समाप्त हो जाता है।
- मिट्टी खोदने से अनेक सूक्ष्म, स्थावर और त्रस जीवों की हिंसा होती है।
- अनेक कंदों में छोटे-छोटे भाग से पुनः अंकुरित होने की क्षमता होती है, जिसे जैन परम्परा साधारण अथवा अनन्तकाय वनस्पति की अवधारणा से जोड़कर देखती है।
इसी कारण आलू को जमीन के स्थान पर किसी बॉक्स, बैग या आधुनिक तकनीक से उगाने मात्र से उसकी आगमिक श्रेणी अपने-आप नहीं बदल जाती। आलू की “आँख” से नया पौधा तैयार होना उसका वानस्पतिक स्वभाव है। स्थान बदलने से किसी पदार्थ का मूल जैविक या आगमिक स्वरूप बदल गया—यह निष्कर्ष तभी स्वीकार किया जा सकता है जब उसके लिए स्पष्ट आगमिक विवेचना उपलब्ध हो।
साथ ही एक दूसरी सत्यनिष्ठ बात भी स्वीकार करनी चाहिए। आधुनिक वनस्पति विज्ञान पौधों की कोशिकाओं, ऊतकों, प्रजनन और सूक्ष्मजीवों का अध्ययन करता है; वह जैन दर्शन के “एक शरीर में अनन्त आत्माओं” के सिद्धान्त को न प्रमाणित करता है, न खण्डित। यह जैन दर्शन की आध्यात्मिक जीव-मीमांसा है, आधुनिक प्रयोगशाला का जैविक वर्गीकरण नहीं।
क्या जमीकंद आयुर्वेदिक या वैज्ञानिक रूप से हानिकारक हैं?
जमीकंद के पूर्ण निषेध को आयुर्वेद या आधुनिक पोषण-विज्ञान के आधार पर सिद्ध करना कठिन है। आयुर्वेद में लहसुन का औषधीय प्रयोग मिलता है और आधुनिक पोषण-विज्ञान अनेक कंदों को कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, विटामिन तथा खनिजों का स्रोत मानता है।
आलू का तला हुआ, अत्यधिक नमक-तेल वाला या अति-प्रसंस्कृत रूप स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है; लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि प्रत्येक जमीकंद अपने मूल स्वरूप में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
इसलिए जमीकंद-त्याग को लेकर सही निष्कर्ष यह है—
जमीकंद का पूर्ण त्याग मुख्यतः जैन अहिंसा, अनन्तकाय की मान्यता और सूक्ष्मजीवों की रक्षा पर आधारित धार्मिक संयम है; यह सार्वभौमिक आयुर्वेदिक अथवा चिकित्सकीय निषेध नहीं है।
फिर भी जमीकंद के बिना संतुलित भोजन सम्भव है। अनाज, दालें, हरी सब्जियाँ, फल, मेवे और बीज उसके पोषक विकल्प प्रदान कर सकते हैं। अतः इसका त्याग स्वास्थ्य को अनिवार्य रूप से क्षति नहीं पहुँचाता, बशर्ते भोजन संतुलित और पोषणपूर्ण हो।
नवकारसी और पोरसी—प्रतिदिन भूख पर विवेक की विजय
नवकारसी, पोरसी, साढ़-पोरसी आदि परम्पराएँ विशेष रूप से श्वेताम्बर समाज में प्रचलित समय-मर्यादाएँ हैं। नवकारसी में सूर्योदय के लगभग 48 मिनट बाद और पोरसी में दिन के प्रथम प्रहर के पश्चात् आहार-जल ग्रहण किया जाता है। अलग-अलग जैन परम्पराओं में इनके आचरण और समय में कुछ भेद हो सकते हैं।
इनका उद्देश्य केवल नाश्ता देर से करना नहीं है। इनका वास्तविक उद्देश्य है—
- जागते ही स्वाद और चाय की माँग के अधीन न होना।
- भूख और इच्छा के बीच अंतर समझना।
- आहार को स्वचालित आदत के स्थान पर सचेत क्रिया बनाना।
- प्रतिदिन कुछ समय इन्द्रिय-संयम का अभ्यास करना।
आधुनिक भाषा में इसे दैनिक “माइक्रो-तप” कहा जा सकता है—ऐसा छोटा अनुशासन जो मनुष्य को यह अनुभव कराता है कि इच्छा उत्पन्न होते ही उसकी पूर्ति करना अनिवार्य नहीं है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से भोजन के बीच उचित अंतर, देर रात खाने से बचना और सीमित भोजन-काल कुछ व्यक्तियों के चयापचय में सहायक हो सकते हैं। लेकिन नवकारसी अथवा पोरसी का आध्यात्मिक मूल्य उसके निश्चित मिनटों से अधिक उस जागरूकता में है, जिसके साथ वह की जाती है।
अष्टमी–चतुर्दशी का प्रोषधोपवास
अष्टमी और चतुर्दशी के उपवास को “साप्ताहिक” कहने के स्थान पर “पाक्षिक पर्व-साधना” कहना अधिक सही होगा। कुछ समुदाय पूर्णिमा और अमावस्या को भी विशेष तप करते हैं, लेकिन प्राचीन श्रावकाचार में प्रोषधोपवास का प्रमुख उल्लेख अष्टमी और चतुर्दशी के संदर्भ में मिलता है।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार में प्रोषधोपवास का अर्थ केवल भोजन छोड़ देना नहीं है। उस दिन साधक से आरम्भ, व्यापारिक व्यस्तता, श्रृंगार और विषयासक्ति को सीमित करके धर्मश्रवण, स्वाध्याय, ध्यान और आत्मनिरीक्षण में समय लगाने की अपेक्षा की गई है।
“उपवास” का गहरा अर्थ है—आत्मा के निकट वास करना।
यदि दिन भर भूखे रहकर मन भोजन, क्रोध, मोबाइल, मनोरंजन और प्रदर्शन में लगा रहे, तो पेट खाली हुआ, चेतना नहीं। वास्तविक उपवास में भोजन का त्याग साधन है; आत्मा की ओर लौटना साध्य है।
तिथि-आधारित उपवास का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। मनुष्य संकल्प तो बहुत करता है, लेकिन नियमितता नहीं रख पाता। पर्वतिथियाँ उसे याद दिलाती हैं कि महीने में कम-से-कम कुछ दिन व्यापार, स्वाद, संग्रह और बाहरी गतिविधियों से हटकर अपने भीतर भी लौटना है।
अष्टमी या चतुर्दशी को शरीर के जल में कोई विशेष वैज्ञानिक ज्वार उत्पन्न होता है और इसलिए उसी दिन उपवास अनिवार्य है—ऐसे लोकप्रिय दावों के लिए अभी पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इन तिथियों का प्रमाणित महत्त्व आध्यात्मिक अनुशासन और नियमित आत्मस्मृति में है।
आयुर्वेद में उपवास—औषधि भी, अति होने पर हानि भी
आयुर्वेद में लंघन को एक चिकित्सकीय उपाय माना गया है और उपवास उसका एक रूप है। मंदाग्नि, आम अथवा कफ-प्रधान कुछ स्थितियों में हल्का भोजन या नियंत्रित उपवास उपयोगी हो सकता है।
लेकिन आयुर्वेद प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक जैसा उपवास निर्धारित नहीं करता। वह प्रकृति, आयु, बल, ऋतु, रोग, पाचनशक्ति और पहले से चले आ रहे आहार को ध्यान में रखता है। चरक परम्परा यह भी सावधान करती है कि अत्यधिक अल्पाहार या लंबे समय तक अनुचित उपवास बल, ऊतक-पोषण और अग्नि को क्षति पहुँचा सकता है।
यही आधुनिक चिकित्सा का भी निष्कर्ष है। समयबद्ध भोजन और अंतराल-उपवास से कुछ लोगों को वजन तथा रक्तशर्करा में सीमित लाभ हो सकते हैं, किंतु यह सामान्य कैलोरी-संयम से हमेशा श्रेष्ठ सिद्ध नहीं हुआ है। गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं, बच्चों, खान-पान संबंधी विकार वाले लोगों तथा मधुमेह की दवा या इंसुलिन लेने वालों के लिए उपवास चिकित्सकीय परामर्श के बिना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
इसलिए जैन तप में भी विवेक आवश्यक है—
शरीर को साधना योग्य बनाना तप है;
शरीर को अहंकारपूर्वक तोड़ देना तप नहीं।
उबला जल—हिंसा का निषेध या स्वास्थ्य की व्यवस्था?
जैन उपवास में प्रयुक्त “गर्म जल” वास्तव में उबालकर प्रासुक किया गया जल है; उसे सदा गर्म अवस्था में पीना आवश्यक नहीं। परम्परा में जल को छानकर, उबालकर और फिर ठंडा करके ग्रहण करने की व्यवस्था मिलती है।
जैन दृष्टि यह स्वीकार करती है कि जल उबालने पर उसमें विद्यमान जीवों की हिंसा होती है। फिर भी तर्क यह दिया जाता है कि एक बार प्रासुक करने के बाद निर्धारित अवधि तक उसमें पुनः जीवोत्पत्ति की सम्भावना सीमित मानी जाती है। इस प्रकार जीवन की अनिवार्यता में बार-बार होने वाली हिंसा को कम करने का प्रयास किया जाता है।
यह शून्य हिंसा नहीं, बल्कि न्यूनतम आवश्यक हिंसा का विवेक है।
आधुनिक विज्ञान भी पुष्टि करता है कि उबालने से अनेक रोगजनक बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी निष्क्रिय हो जाते हैं। इसलिए असुरक्षित जल की स्थिति में उबालकर और सुरक्षित रूप से संग्रहित किया गया जल स्वास्थ्य की रक्षा करता है।
लेकिन विज्ञान ने जल में जैन दर्शन द्वारा वर्णित अप्कायिक आत्माओं या असंख्यात जीवों की आध्यात्मिक अवधारणा प्रमाणित नहीं की है। विज्ञान सूक्ष्मजीवों को देखता है; जैन दर्शन उनसे आगे जीवात्मा की सत्ता पर विचार करता है। दोनों में संवाद सम्भव है, लेकिन दोनों को एक ही सिद्ध करना उचित नहीं।
आहार का अंतिम उद्देश्य—पेट भरना नहीं, प्रमाद घटाना
मांसाहार का त्याग हमें करुणा सिखाता है।
जमीकंद का त्याग हमें सूक्ष्म जीवन के प्रति संवेदनशील बनाता है।
नवकारसी और पोरसी हमें इच्छा पर विराम लगाना सिखाती हैं।
प्रोषधोपवास हमें स्वाद, व्यापार और बाहरी व्यस्तता से हटाकर आत्मा के निकट लाता है।
प्रासुक जल हमें बताता है कि जीवन की अनिवार्यताओं में भी हिंसा को कम करने का प्रयास किया जा सकता है।
इन नियमों का स्वास्थ्य से संबंध अवश्य है, लेकिन केवल स्वास्थ्य ही उनका कारण नहीं है। यदि शरीर को स्वस्थ रखना ही अंतिम कसौटी होती, तो आयुर्वेद में औषधि माने गए अनेक पदार्थ जैन धर्म में निषिद्ध नहीं होते। जैन दर्शन की कसौटी अधिक व्यापक है—
कोई पदार्थ मेरे शरीर को क्या देता है, यह महत्त्वपूर्ण है;
लेकिन उसे प्राप्त करने में किसी दूसरे जीव को क्या खोना पड़ा—यह उससे भी बड़ा प्रश्न है।
जैन आहार-विधान का सार यह नहीं कि संसार के सभी लोग हमारे समान ही भोजन करें। उसका सार यह है कि मनुष्य अपने भोजन के पीछे छिपी हिंसा, आसक्ति, पर्यावरणीय प्रभाव और मानसिक प्रवृत्ति के प्रति जागरूक बने।
अंततः जैन धर्म मनुष्य से केवल थाली बदलने को नहीं कहता; वह उसकी दृष्टि बदलना चाहता है।
जैन आहार-विधान न केवल स्वास्थ्य-विज्ञान है और न केवल पाप–पुण्य की भय-भाषा। उसका मूल लक्ष्य अहिंसा, इन्द्रिय-संयम और अनासक्ति के माध्यम से संवर–निर्जरा है। स्वस्थ शरीर उसका महत्त्वपूर्ण सहयोगी है; करुणा उसका नैतिक आधार है; और जागृत चेतना उसका अंतिम उद्देश्य है।
प्रमुख ग्रंथ एवं शोध-संदर्भ
- अनगारधर्मामृत में शरीर और धर्म-साधना
- तत्त्वार्थसूत्र 9.2—संवर के कारण
- तत्त्वार्थसूत्र 9.3—तप से संवर और निर्जरा
- तत्त्वार्थसूत्र 9.19—छह बाह्य तप
- पुरुषार्थसिद्ध्युपाय और श्रावक के मूलगुण
- मूलाचार में प्रत्येक और अनन्तकाय वनस्पति
- रत्नकरण्ड श्रावकाचार—प्रोषधोपवास
- चरकसंहिता—आहार के आठ विचारणीय कारक
- चरकसंहिता—लंघन और उपवास
- चरकसंहिता—मांसवर्ग और आहार-विवेचना
- WHO/IARC—लाल और प्रसंस्कृत मांस पर निष्कर्ष
- NIH—समय-सीमित भोजन के स्वास्थ्य-प्रभाव
- CDC—जल उबालने की वैज्ञानिक उपयोगिता