महावीर दर्शनपरम्परा से प्रज्ञा की ओर

युवा पीढ़ी से संवादविकास जैन

क्रिया से आचरण तक : धर्म का आत्म-प्रयोग

महावीर को भगवान मानना हमारी श्रद्धा है। महावीर ने जो मार्ग दिखाया, उसका एक कदम अपने जीवन में उतारना हमारा पुरुषार्थ है। जब धर्म की क्रिया हमें यह कदम उठाने में सहायता देती है, तब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई देने लगता है।

क्रिया से आचरण तक : धर्म का आत्म-प्रयोग

हममें से अनेक लोग बचपन से पूजा, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप और व्रत करते आए हैं। इन क्रियाओं ने जीवन में अनुशासन भी दिया है। फिर भी एक प्रश्न स्वयं से पूछना आवश्यक है—क्या इनके साथ हमारे क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और मोह में भी कमी आई है?

मेरी पुस्तक “महावीर : जीवन का विज्ञान” का मूल प्रश्न भी यही है। वर्धमान से महावीर बनने की यात्रा किसी वरदान की प्रतीक्षा नहीं थी; वह स्वयं को समझने और बदलने की साधना थी। हम महावीर को पूजते हैं, उनके उपदेश सुनते हैं, लेकिन जब जीवन में कठिन परिस्थिति आती है, तब हमारा मन किस दिशा में जाता है? धर्म की परीक्षा वहीं होती है।

दुःख में हमारा हिस्सा कितना है?

मान लीजिए, अजय ने अपने बेटे को काले ब्रीफ़केस में पाँच लाख रुपये देकर संजय के पास भेजा। थोड़ी देर बाद किसी ने आकर बताया कि बाज़ार में काला ब्रीफ़केस लूट लिया गया है। अजय घबरा गया। तभी बेटा लौटा और बोला, “मैं रुपये संजय को दे चुका था। लूट उसके साथ हुई है।” अजय ने राहत की साँस ली।

रुपये फिर भी लूटे गए थे। पहले अजय को लगा कि हानि उसकी है; बाद में मालूम हुआ कि हानि संजय की है। इस कहानी में केवल सुख-दुःख का बदलना नहीं दिखता। यह भी दिखता है कि जिस क्षण समस्या ‘मेरी’ नहीं रही, मेरी चिंता भी कम हो गई। क्या संजय की पीड़ा अब कम वास्तविक थी? यह प्रश्न हमें अपने मोह के साथ अपनी करुणा को भी परखने के लिए कहता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि आर्थिक हानि, बीमारी या किसी प्रियजन का बिछोह केवल मन का भ्रम है। ये वास्तविक कठिनाइयाँ हैं। उपचार, सहायता और सहानुभूति की आवश्यकता भी वास्तविक है। जैन दर्शन का समभाव हमें ऐसी परिस्थितियों में अपने भीतर उठते राग-द्वेष को पहचानना और संभव हो तो विवेकपूर्वक कदम उठाना सिखाता है।

एक रेस्तराँ का छोटा-सा दृष्टांत याद आता है। कॉकरोच अचानक एक अतिथि के पास आ गया। वह घबरा गई; आसपास के लोग भी परेशान हो गए। कुछ देर बाद वेटर ने उसे देखा, क्षण भर ठहरा और सावधानी से बाहर कर दिया। घबराना स्वाभाविक था। अंतर इतना था कि वेटर ने घबराहट के बाद अपना अगला कदम सोचकर उठाया। जीवन में भी कई बार हमें परिस्थिति चुनने का अवसर नहीं मिलता, पर उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया सँभालने का अभ्यास किया जा सकता है।

क्रिया हमें किस ओर ले जा रही है?

मंदिर जाना, स्थानक में बैठना, सामायिक करना, प्रतिक्रमण, उपवास या भोजन संबंधी नियमों का पालन करना—इन सबका स्थान जैन साधना में है। प्रत्येक क्रिया के बाद हम अपने जीवन से एक प्रश्न पूछ सकते हैं।

सामायिक में समता का अभ्यास किया, तो क्या दिन में किसी की कटु बात सुनकर कुछ देर ठहर सके? प्रतिक्रमण में भूल स्वीकार की, तो क्या उस व्यक्ति से क्षमा भी माँगी जिसे हमारे शब्दों से चोट पहुँची थी? तप किया, तो क्या उसके साथ सम्मान पाने की इच्छा और अभिमान को भी पहचान सके?

करेमि भन्ते सूत्र में सामायिक की अवधि के लिए सावद्य प्रवृत्तियों के त्याग का संकल्प लिया जाता है। उस संकल्प का अनुभव हमें यह समझने में सहायता कर सकता है कि मन, वचन और शरीर से होने वाली हानि को दैनिक जीवन में भी कैसे कम किया जाए।

एक बार मैं आचार्य श्री रामलालजी महाराज साहब की परंपरा के एक संत के दर्शन के लिए गया। वहाँ प्रवेश के लिए मुँहपत्ती पहनने की मर्यादा थी। मैंने उसे पहन लिया। मेरे साथ आए मंदिरमार्गी श्रावक ने अपनी परंपरा की दृष्टि से बाहर प्रतीक्षा करना उचित समझा। उस घटना के बाद मेरे मन में प्रश्न उठा—क्या हम अपनी-अपनी मर्यादाओं का आदर करते हुए एक-दूसरे से बात करने का रास्ता खोज सकते हैं?

जैन परंपराओं के आचार में भिन्नता है। उस दिन मेरी सहजता को दूसरे व्यक्ति की श्रद्धा का मापदंड बना देना भी उचित नहीं होता। अनेकान्त का अभ्यास शायद यहीं से शुरू होता है: दूसरे की बात को समझने का प्रयास करें, अपना मत स्पष्ट रखें और मतभेद को मनभेद न बनने दें।

आशीर्वाद के साथ पुरुषार्थ भी

कठिन समय में हम गुरु से मंगलपाठ सुनना चाहते हैं, भगवान के सामने बैठना चाहते हैं, किसी अपने से आश्वासन चाहते हैं। इस चाह में कुछ अनुचित नहीं है। समस्या तब आती है जब हम अपने हिस्से का परिवर्तन भी केवल किसी और से चाहते हैं।

जैन कथाओं में अर्जुनमाली का प्रसंग इसी दृष्टि से विचारणीय है। हिंसा में डूबे उस व्यक्ति ने महावीर का मार्ग सुना, अपने कर्मों पर पश्चात्ताप किया और फिर दीक्षा, संयम तथा कठिन साधना का जीवन अपनाया। कथा का परिवर्तन किसी एक क्षण की भावना पर समाप्त नहीं होता; उसके बाद का आचरण भी उसका हिस्सा है।

क्षमा, प्रतिक्रमण और अंतिम समय की समता का जैन धर्म में गहरा महत्त्व है। संलेखना जैसी गंभीर साधना को भी केवल अंतिम क्षण में किया जाने वाला उपाय या अगले जन्म की गारंटी मानकर नहीं समझा जा सकता। आज किसी से क्षमा माँगना और कल फिर वही चोट पहुँचाना हमें अपने संकल्प पर दोबारा विचार करने के लिए कहता है।

कोरोना महामारी के दिनों ने हममें से अनेक लोगों को धन, स्वास्थ्य और परस्पर सहायता के संबंध पर सोचने के लिए विवश किया। आजीविका कमाना आवश्यक है। उसे ईमानदारी से अर्जित करना, परिवार की देखभाल करना और सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद के काम आना—ये जीवन के साथ चलने वाली जिम्मेदारियाँ हैं। जैन धर्म का पुण्य हमें करुणामय व्यवहार पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करता है।

आत्मा, विज्ञान और हमारी ईमानदारी

जैन दर्शन आत्मा की पहचान चेतना से करता है। इस दार्शनिक विचार को समझने के लिए आत्मा को भौतिकी की ‘ऊर्जा’ कह देना आवश्यक नहीं है। इसी तरह, कभी किसी को याद करते ही उसका फोन आ जाए तो वह अनुभव सुखद हो सकता है; उस संयोग को टेलीपैथी का वैज्ञानिक प्रमाण कहना जल्दबाज़ी होगी।

“महावीर : जीवन का विज्ञान” के भाव में मेरे लिए विज्ञान का अर्थ हर धार्मिक अनुभव के लिए वैज्ञानिक शब्द ढूँढ़ना नहीं है। इसका अर्थ है—अपने अनुभव को ध्यान से देखना, अपने निष्कर्ष को परखना और जहाँ प्रमाण न हो, वहाँ उतनी ही विनम्रता से बात कहना। धर्म के क्षेत्र में भी यह ईमानदारी हमारे चिंतन को गहरा बनाती है।

रात को कुछ क्षण रुककर हम स्वयं से पूछ सकते हैं: आज कहाँ मैंने क्रोध में उत्तर दिया? कहाँ मैं किसी की पीड़ा समझ सका? कल किस एक व्यवहार को बदलने का प्रयास करूँगा?

महावीर को भगवान मानना हमारी श्रद्धा है। महावीर ने जो मार्ग दिखाया, उसका एक कदम अपने जीवन में उतारना हमारा पुरुषार्थ है। जब धर्म की क्रिया हमें यह कदम उठाने में सहायता देती है, तब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई देने लगता है।

जय महावीर!