महावीर दर्शनपरम्परा से प्रज्ञा की ओर

युवा पीढ़ी से संवादविकास जैन

धर्म समझने का आरंभिक ज्ञान क्या है?

समभाव से सम्यक दृष्टि तक

धर्म समझने का आरंभिक ज्ञान क्या है?

समभाव से सम्यक दृष्टि तक

धार्मिक क्रियाएँ करना सरल हो सकता है; उनके पीछे का भाव समझना अधिक ध्यान माँगता है। हम सामायिक करें और उसके बाद भी छोटी-सी बात पर क्रोध से भर जाएँ, तो प्रश्न सामायिक की उपयोगिता का नहीं, उसके अर्थ को अपने जीवन में उतारने का है। इसलिए धर्म की यात्रा में आरंभिक ज्ञान आवश्यक है।

यह ज्ञान कहाँ से शुरू होता है?

जैन दर्शन मनुष्य जीवन को आत्मकल्याण और मोक्ष की साधना का दुर्लभ अवसर मानता है। इसका अर्थ परिवार, आजीविका या समाज से विमुख होना नहीं है। इन्हीं संबंधों और जिम्मेदारियों के बीच हम देख सकते हैं कि हमारे निर्णयों में कितनी अहिंसा है, वाणी में कितना संयम है और मन में कितना राग-द्वेष है। जीवन का प्रत्येक दिन इस दृष्टि से साधना का अवसर बन सकता है।

पहला पाठ : स्वयं को देखना सीखें

मान लीजिए, किसी ने हमारा अपमान किया। उस क्षण सामने वाले के शब्द सुनाई देते हैं; भीतर उठता क्रोध प्रायः ध्यान से छूट जाता है। दृष्टा भाव का आरंभ वहीं है—अपनी प्रतिक्रिया को पहचानना। क्या मैं तत्काल चोट पहुँचाने वाले शब्द कह रहा हूँ? क्या मैं उस घटना को बार-बार मन में दोहरा रहा हूँ? क्या उत्तर देने से पहले कुछ क्षण ठहर सकता हूँ?

समभाव का अर्थ भावनाओं को मिटा देना नहीं, उनके प्रभाव में विवेक खोने से बचना है।

किसी शारीरिक कठिनाई से जूझते व्यक्ति या घायल जीव को देखकर हम उसके पिछले जन्म के कर्मों की कहानी नहीं जान सकते। उसके प्रति करुणा रखना और संभव हो तो सहायता करना हमारे हाथ में है। इसी तरह किसी संयमी या गुणी व्यक्ति को देखकर ईर्ष्या के स्थान पर उसके गुणों के प्रति प्रसन्नता रखी जा सकती है। जैन दर्शन की मैत्री, प्रमोद, करुणा और माध्यस्थ्य की भावनाएँ हमें यही अभ्यास कराती हैं। पीड़ित के प्रति करुणा और गुणी के प्रति प्रमोद—दोनों समभाव के साथ रह सकते हैं।

दूसरा पाठ : जीव और कर्मबंध को समझें

धर्म के आरंभिक अध्ययन में जैन दर्शन के सात तत्त्व एक आधार देते हैं—जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष।

सरल शब्दों में, जीव चेतन है और अजीव अचेतन। मन, वचन और शरीर की प्रवृत्तियों तथा कषायों के कारण कर्मों का आस्रव और बंध होता है। संयम से नए कर्मबंध को रोकने की दिशा संवर है; साधना से बँधे कर्मों के क्षय की दिशा निर्जरा है। कर्मों से पूर्ण मुक्ति मोक्ष है।

इसे केवल परिभाषाओं की तरह याद करना पर्याप्त नहीं। जब क्रोध के समय हम अपनी वाणी को रोकते हैं, तब समझ में आता है कि संयम की आवश्यकता कहाँ पड़ती है। जब किसी से गलती स्वीकार करते हैं, तब अहंकार को पहचानने का अवसर मिलता है। शास्त्र का अध्ययन हमें इन अनुभवों को समझने की भाषा देता है; चिंतन और अभ्यास उस समझ को गहरा करते हैं।

जैन परंपरा में चौरासी लाख योनियों का उल्लेख जीवों की विविध जन्म-स्थितियों के संदर्भ में आता है। इसे आधुनिक जीवविज्ञान की प्रजातियों की गणना समझने की आवश्यकता नहीं है। हमारे लिए उसका प्रमुख संकेत यह है कि मनुष्य जीवन में विचार करने, निर्णय बदलने और सचेत साधना करने का मूल्यवान अवसर मिला है।

तीसरा पाठ : मोक्षमार्ग के तीन आधार

तत्त्वार्थसूत्र का आरंभ ही इस सूत्र से होता है—

सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।

अर्थात् सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र मिलकर मोक्षमार्ग बनाते हैं।

सम्यक दर्शन का अर्थ है जीवन और आत्मा से जुड़े तत्त्वों को यथार्थ रूप में समझने की श्रद्धा विकसित करना। सम्यक ज्ञान उस श्रद्धा को सही अध्ययन और विवेक से स्पष्ट करता है। सम्यक चारित्र समझे हुए सत्य को संयमपूर्ण आचरण में उतारता है। ये तीनों साथ चलते हैं। इसलिए किसी धार्मिक सूत्र पर विश्वास करना, उसका अर्थ जानना और कठिन परिस्थिति में भी उसके अनुसार व्यवहार करने का प्रयत्न—तीनों आवश्यक हैं।

शास्त्र पढ़ने वाला व्यक्ति ‘केवल जानकार’ है, ऐसा कहकर स्वाध्याय का महत्त्व कम नहीं करना चाहिए। अध्ययन ज्ञान का आवश्यक आधार हो सकता है। साथ ही, बहुत-सा पढ़ लेने के बाद भी यदि अहंकार बढ़ रहा हो, तो अपने अध्ययन के उद्देश्य को फिर से परखना चाहिए।

यह ज्ञान कैसे प्राप्त करें?

आरंभ के लिए कोई असाधारण अनुभव आवश्यक नहीं। कुछ नियमित अभ्यास पर्याप्त आधार बना सकते हैं।

पहले, किसी विश्वसनीय शिक्षक की सहायता से जैन दर्शन के मूल तत्त्व पढ़ें। जो बात समझ न आए, उस पर प्रश्न करें। सुनने और पूछने के बाद स्वयं भी विचार करें कि उसका जीवन में क्या अर्थ है।

दूसरे, प्रतिदिन अपनी किसी एक प्रतिक्रिया को देखें। उदाहरण के लिए, क्रोध आने पर कुछ क्षण रुकें और बाद में लिखें—उस समय मैं क्या सोच रहा था, मैंने क्या कहा और अगली बार क्या बदल सकता हूँ? इससे ‘संयम’ पुस्तक का शब्द भर नहीं रहता।

तीसरे, सामायिक, प्रतिक्रमण और अन्य धार्मिक क्रियाओं के भाव को दिन के व्यवहार से जोड़ें। सामायिक में समता का संकल्प लिया है, तो घर या कार्यस्थल पर मतभेद के समय उसे याद करें। प्रतिक्रमण में भूल स्वीकार की है, तो जहाँ संभव हो, उससे प्रभावित व्यक्ति से भी क्षमा माँगें।

चौथे, अपने ज्ञान की परीक्षा दूसरों के प्रति व्यवहार में करें। किसी पीड़ित के लिए करुणा, किसी गुणी के लिए प्रसन्नता और असहमति में भी अहिंसक वाणी—ये आत्मचिंतन को जीवन से जोड़ते हैं।

दीक्षा, साधु और मार्गदर्शन

दीक्षा जीवन का गंभीर निर्णय है। उसके लिए स्थिर वैराग्य, संयम के प्रति प्रतिबद्धता, शास्त्र का अध्ययन और योग्य गुरु का मार्गदर्शन महत्त्वपूर्ण हैं। जल्दबाज़ी से बचना उचित है; साथ ही यह अपेक्षा भी उचित नहीं कि दीक्षा से पहले व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो चुका हो। साधना सीखने और आगे बढ़ने की यात्रा भी है।

संतों के प्रवचन को भी उसके भाव और आचरण से परखना चाहिए। जहाँ भय या चमत्कार के आकर्षण से अधिक अहिंसा, आत्मचिंतन और पुरुषार्थ की शिक्षा मिले, वहाँ धर्म को समझने में सहायता मिलती है। किसी ज्ञानी साधु का समाज को मार्गदर्शन देना आत्मकल्याण से विरोध नहीं रखता। जैन परंपरा में महावीर ने केवलज्ञान के बाद भी लंबे समय तक लोगों को मार्ग दिखाया।

महावीर का मार्ग कहाँ दिखाई देता है?

कभी सृजन, पालन और परिवर्तन के उदाहरण जीवन को समझाने में सहायक लगते हैं। कभी दूसरी आध्यात्मिक परंपराओं के चक्रों की भाषा हमें आकर्षित करती है। उनका अध्ययन किया जा सकता है, पर उनसे जैन सूत्रों का अर्थ बदलना उचित नहीं होगा। महावीर के मोक्षमार्ग को समझने के लिए हमारे पास स्पष्ट आधार है—सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र; और दैनिक जीवन में अहिंसा, संयम तथा कषायों को घटाने का पुरुषार्थ।

महावीर की साधना बारह वर्षों से अधिक चली। उस यात्रा को देखकर हमें अपनी प्रगति का समय तय करने की जल्दी छोड़नी चाहिए। आज का प्रश्न अधिक सरल और अधिक सच्चा है: क्या मैं कल की तुलना में आज थोड़ा अधिक सजग, करुणामय और संयमी हूँ?

यही आरंभिक ज्ञान पाने का रास्ता है—पढ़ना, प्रश्न करना, स्वयं को देखना और फिर अपने व्यवहार को सुधारना। महावीर का संदेश किसी एक समाज तक सीमित नहीं है। जब हम सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव के प्रति सावधानी और प्रत्येक मनुष्य के प्रति सम्मान रखते हैं, तब वह संदेश हमारे जीवन से आगे बढ़ता है।

श्रद्धा यात्रा शुरू कराती है; हर दिन का आत्म-प्रयोग हमें उस मार्ग पर चलना सिखाता है।

जय महावीर!