चातुर्मास : प्रवचन से आचरण तक
जब लोग हमें नाम से पहले हमारे व्यवहार में अहिंसा और सत्य को पहचानने लगें, तब चातुर्मास का संदेश प्रवचन स्थल से निकलकर समाज तक पहुँचेगा।
चातुर्मास : प्रवचन से आचरण तक
वर्षा में धरती पर जीवन की हलचल बढ़ जाती है। रास्तों पर दिखाई देने वाले छोटे जीव हमें याद दिलाते हैं कि हमारा चलना भी सावधानी माँगता है। जैन और हिन्दू, दोनों परंपराओं में चातुर्मास के दौरान साधु-संन्यासियों के एक स्थान पर ठहरने की परंपरा है। जैन साधु-साध्वियों के लिए यह अहिंसा और संयम के अनुशासन से गहराई से जुड़ी है।
श्रावक-श्राविकाओं के जीवन में जिम्मेदारियाँ अलग होती हैं। फिर भी चातुर्मास उन्हें अपनी यात्राओं और गतिविधियों पर विचार करने का अवसर देता है। अनावश्यक आना-जाना घटाना और वर्षा में अधिक सावधानी रखना उसी जीवदया को गृहस्थ जीवन में उतारने का प्रयास है।
आज चातुर्मास में प्रवचन होते हैं, अनुष्ठान होते हैं और बड़े आयोजन भी सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। संतों का एक स्थान पर रहना समाज के लिए सीखने का मूल्यवान अवसर है। किंतु यदि किसी घर में अगली पीढ़ी नवकार मंत्र का सही उच्चारण या उसके पाँच पदों का अर्थ भी नहीं जानती, तो हमें अपनी धार्मिक शिक्षा की दिशा पर विचार करना चाहिए। आयोजन संपन्न हुआ—अब उसकी सीख घर तक कैसे पहुँचे?
मेरा संतों से विनम्र आग्रह है कि प्रत्येक चातुर्मास में श्रावक के बारह व्रतों पर क्रमबद्ध संवाद अवश्य हो। पाँच अणुव्रत—अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—गृहस्थ के आचरण को दिशा देते हैं। तीन गुणव्रत उसकी गतिविधियों और उपभोग में सीमा का अभ्यास कराते हैं। चार शिक्षाव्रत समता, तप, संयम और सेवा को नियमित जीवन में स्थान देने की प्रेरणा देते हैं। इनके नाम याद कराने के साथ यह भी समझाया जाए कि परिवार, व्यापार और समाज में इन्हें कैसे जिया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, सत्य का व्रत व्यापारी के लिए सही तौल और वस्तु की सही जानकारी देने में दिखाई देगा। अहिंसा हमारी वाणी और व्यवहार में भी परखी जाएगी। अपरिग्रह का प्रश्न तब उठेगा जब पर्याप्त होने पर भी और अधिक पाने की इच्छा हमें बेचैन करे। इस तरह व्रत पुस्तक के पन्नों से निकलकर हमारे निर्णयों में आने लगते हैं।
जैन परिवार में जन्म लेना हमें एक परंपरा और उसके संस्कारों से परिचित कराता है। उसकी सार्थकता हमारे आचरण से तय होगी। किस व्यक्ति का जन्म किस धर्म के परिवार में हुआ, इसके आधार पर उसके पूर्वकर्मों या आध्यात्मिक स्तर का निर्णय करना हमारे ज्ञान के बाहर है। जैन होने का गर्व दूसरे समुदायों को छोटा कहने में नहीं, अपने जीवन में अहिंसा, अनेकांत और करुणा बढ़ाने में दिखाई देना चाहिए।
धार्मिक अनुष्ठानों और मंत्र-जप के प्रति लोगों की आस्था है। उनके साथ एक प्रश्न लगातार जुड़ा रहना चाहिए: क्या इससे मेरा भय और लोभ घट रहा है? यदि हम सांसारिक लाभ खोने के डर से दान दें, या किसी फल की आशा में ही साधना करें, तो अपने भावों को समझने की आवश्यकता और बढ़ जाती है। दान में विवेक हो, आराधना में श्रद्धा हो और प्रवचन के बाद व्यवहार में परिवर्तन का प्रयास हो—तभी चातुर्मास की शिक्षा जीवन तक पहुँचेगी।
आज हमारे पास धार्मिक जानकारी बहुत है। ज्ञान की पहचान इस बात से होगी कि वह कठिन क्षणों में हमारे निर्णय को कैसे बदलता है। अगली बार क्रोध आए तो कुछ क्षण रुकें। किसी लेन-देन में अपना लाभ चुनने का अवसर हो तो सत्य का व्रत याद करें। किसी जीव के प्रति असावधानी हो जाए तो उसे पहचानकर आगे अधिक सजग रहें। यही छोटे आत्म-प्रयोग वर्धमान से महावीर की यात्रा को हमारे अपने जीवन से जोड़ते हैं।
इस चातुर्मास हम एक सरल संकल्प ले सकते हैं: नवकार मंत्र का अर्थ परिवार के साथ समझें, बारह व्रतों का अध्ययन करें और हर सप्ताह एक व्रत को व्यवहार में परखें। संत मार्ग दिखाएँ, श्रावक प्रश्न पूछें और घरों में उस सीख पर संवाद हो।
जब लोग हमें नाम से पहले हमारे व्यवहार में अहिंसा और सत्य को पहचानने लगें, तब चातुर्मास का संदेश प्रवचन स्थल से निकलकर समाज तक पहुँचेगा।
जय महावीर!