महावीर दर्शनपरम्परा से प्रज्ञा की ओर

जैन दर्शन एवं विचारविकास जैन

श्रेष्ठ पाने से आगे, श्रेष्ठ होने की यात्रा

जीवन की सार्थकता केवल श्रेष्ठ पाने में नहीं, श्रेष्ठ करने और श्रेष्ठ होने में है।

—विकास जैन✍️

संसार एक ऐसा मायाजाल है, जिसमें सत्य और असत्य, सुंदरता और कुरूपता, सुख और दुःख साथ-साथ मिलते हैं। हम उसके सुख को चुन लेना चाहते हैं, लेकिन उससे जुड़ी चिंता, असुरक्षा और वियोग को स्वीकार नहीं करना चाहते। हमारी उलझन यहीं से शुरू होती है।

दूसरों का धन, वैभव, शक्ति और रूप हमें आकर्षित करते हैं।
मन कहता है, काश! यह सब मेरे पास भी होता। लेकिन जिस जीवन की चमक देखकर हम मोहित होते हैं, उसके भीतर की बेचैनी, संघर्ष और अकेलेपन को कितना जानते हैं? हम किसी के जीवन का एक आकर्षक दृश्य देखकर उसके जैसा पूरा जीवन चाहने लगते हैं।

जिनकी उपलब्धियाँ हमें लुभाती हैं, उनके जीवन का संपूर्ण वृत्तांत और अंत भी देखने योग्य है।


वैभव कितना साथ गया?
सत्ता कितनी देर ठहरी?
शरीर का सौंदर्य कितना बचा?

इन प्रश्नों पर विचार करने के बाद भी यदि हमारी लालसा ज्यों की त्यों बनी रहे, तो समझना चाहिए कि जानकारी बढ़ी है, विवेक अभी नहीं जागा।

जैन दर्शन की दृष्टि से राग, द्वेष और आसक्ति जीव को संसार से बाँधे रखते हैं। अगले जन्म की गति का अनुमान लगाने से अधिक आवश्यक यह देखना है कि आज हमारे भीतर कैसे भाव पल रहे हैं। जिस तृष्णा को हम सफलता की प्रेरणा मान रहे हैं, कहीं वही हमारे बंधन को और दृढ़ तो नहीं कर रही?

जीवन की सार्थकता केवल श्रेष्ठ पाने में नहीं, श्रेष्ठ करने और श्रेष्ठ होने में है।
राजा और रंक की बाहरी परिस्थितियों में बड़ा अंतर हो सकता है; अभाव की पीड़ा भी वास्तविक है। फिर भी संपन्नता अपने आप शांति की गारंटी नहीं बन जाती। महलों में चिंतित लोग मिलते हैं और सीमित साधनों में संतुष्ट व्यक्ति भी। उपलब्ध वस्तुओं के साथ मन का संबंध भी तय करता है कि जीवन में आनंद कितना होगा और अशांति कितनी।

*यह विडंबना देखिए—त्यागी संतों के द्वार पर धनवान और शक्तिशाली लोग भी शांति की खोज में पहुँचते हैं। लेकिन वहाँ जाकर हम माँगते क्या हैं? प्रायः और धन, और पद, और प्रभाव!*

जिस संत की निस्पृहता हमें उसके द्वार तक खींच लाती है, उसी के सामने हम अपनी इच्छाओं की सूची खोल देते हैं।

हम उनके जैसा संतोष चाहते हैं, पर अपनी तृष्णा छोड़ने को तैयार नहीं होते। जिन उपलब्धियों को खोने के भय से बेचैन हैं, उन्हीं का विस्तार माँगते रहते हैं। तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—हम शांति खोज रहे हैं या अपनी अशांति के लिए और साधन जुटा रहे हैं?

देव, गुरु अथवा किसी आस्था-केंद्र के समक्ष आत्मकल्याण का भाव जागना चाहिए। प्रार्थना हमारे विवेक, संयम और पुरुषार्थ को बल दे। यदि हम अपने हिस्से का प्रयास भी किसी चमत्कार के भरोसे छोड़ दें, तो अपनी ही सामर्थ्य से दूर होने लगते हैं।

इच्छाओं का विसर्जन जिम्मेदारियों से विमुख होना नहीं है। परिवार सँभालना, आजीविका कमाना और समाज के लिए उपयोगी कार्य करना जीवन के आवश्यक दायित्व हैं। साधना यह है कि इन्हें निभाते हुए संग्रह, तुलना और अहंकार की भूख हमें संचालित न करे।

मानव जीवन तब सार्थक होने लगता है, जब अपने लिए और पाने की व्याकुलता घटती है तथा दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदना बढ़ती है। भीतर संतोष और समस्त जीवों के लिए करुणा जागती है।

*आत्मकल्याण की दिशा में सबसे गहरा प्रश्न यही है—मैंने जीवन में कितना पाया, इससे आगे बढ़कर, जो पाया उसके बीच रहते हुए मैं क्या बन पाया?*