एक जैन गृहस्थ के छह दैनिक कर्तव्य
देवपूजा गुरूपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः। दानं चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने दिने॥
एक जैन गृहस्थ के छह दैनिक कर्तव्य
गृहस्थ जीवन में परिवार, काम और समाज की अनेक जिम्मेदारियाँ होती हैं। इन्हीं के बीच अपने विचार और व्यवहार को सँवारने का मार्ग जैन परंपरा इस श्लोक में बताती है—
देवपूजा गुरूपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः।
दानं चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने दिने॥
अर्थात् देवपूजा, गुरु-उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान—ये गृहस्थ के छह दैनिक कर्तव्य हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि आत्मकल्याण की साधना जीवन से अलग नहीं है; उसे प्रतिदिन के जीवन में ही करना है।
१. देवपूजा — अपने आदर्श को याद करना
अरिहंतों और सिद्धों की वंदना हमें उनके गुणों की ओर देखने का अवसर देती है। अपनी परंपरा के अनुसार प्रतिमा के सामने, स्तवन में या ध्यान में बैठकर हम स्वयं से पूछ सकते हैं: क्या आज मेरे क्रोध में कुछ कमी आई? क्या मैंने किसी के प्रति अधिक करुणा रखी? पूज्य गुणों का स्मरण हमारे आचरण को दिशा दे, यही पूजा का सार है।
२. गुरु-उपासना — मार्गदर्शन को जीवन में उतारना
आचार्य, उपाध्याय और संयमी साधु-साध्वियाँ अपने आचरण और शिक्षाओं से साधना का मार्ग समझाते हैं। उनका आदर करना, यथाशक्ति सेवा करना और उनकी बातों पर विचार करना गुरु-उपासना है। गुरु के प्रति श्रद्धा तब गहरी होती है, जब सीखी हुई बात हमारे व्यवहार में भी दिखाई देती है।
३. स्वाध्याय — पढ़े हुए को परखना
शास्त्र पढ़ना स्वाध्याय की शुरुआत है। यदि अहिंसा पर पढ़ने के बाद हम अपनी वाणी की कठोरता पहचानें, या अपरिग्रह पर विचार करके किसी अनावश्यक इच्छा को छोड़ें, तो पढ़ा हुआ ज्ञान जीवन से जुड़ता है। प्रतिदिन थोड़ा अध्ययन और थोड़ा आत्मचिंतन भी हमें सजग बना सकता है।
४. संयम — प्रतिक्रिया से पहले ठहरना
भोजन, वाणी, इंद्रियों और उपभोग में मर्यादा रखना संयम है। किसी की बात से क्रोध आए और हम उत्तर देने से पहले ठहर जाएँ; किसी जीव को हानि पहुँचने की आशंका हो और हम सावधानी बरतें—ऐसे छोटे निर्णय संयम को दैनिक अभ्यास बनाते हैं।
५. तप — इच्छाओं को दिशा देना
तप में सामर्थ्य के अनुसार उपवास जैसे बाह्य अभ्यास भी हैं और प्रायश्चित्त, विनय, सेवा तथा ध्यान जैसे आंतरिक अभ्यास भी। इसका उद्देश्य इच्छाओं और कषायों पर ध्यान देना है। तप हमें यह देखने का अवसर देता है कि हम किसी इच्छा के पीछे क्यों भाग रहे हैं और क्या उससे मुक्त होकर अधिक शांत रह सकते हैं।
६. दान — अपनी साधना में करुणा जोड़ना
जैन परंपरा आहार, औषध, ज्ञान और अभय—इन चार प्रकार के दान का उल्लेख करती है। किसी जरूरतमंद को भोजन देना, उपचार में सहायता करना, उपयोगी ज्ञान बाँटना और भयभीत जीव को सुरक्षा देना इसके रूप हैं। दान के साथ विनम्रता हो, तो देने वाला भी अपने अहंकार को पहचानना सीखता है।
इन छह कर्तव्यों की शुरुआत बाहर से होती दिखाई दे सकती है, लेकिन हर एक हमें भीतर देखने के लिए प्रेरित करता है। पूजा आदर्श की याद दिलाती है, गुरु दिशा देते हैं, स्वाध्याय समझ बढ़ाता है, संयम व्यवहार सँभालता है, तप इच्छाओं को परखता है और दान करुणा को कर्म में बदलता है।
जैन धर्म की विशेष प्रेरणा
जैन दर्शन में अरिहंत और सिद्ध इसलिए पूज्य हैं कि उन्होंने आत्मविजय और कर्ममुक्ति की अवस्था प्राप्त की है। उनका जीवन साधक को अपने भीतर परिवर्तन की संभावना दिखाता है। भगवान महावीर को प्रणाम करते समय हम उस मार्ग को भी याद करें जिस पर उन्होंने चलने की प्रेरणा दी—अहिंसा, संयम और आत्मजागरण का मार्ग।
महावीर के चरणों में झुकना श्रद्धा है; उनके दिखाए मार्ग पर प्रतिदिन एक कदम चलना उस श्रद्धा का आचरण है।