जैन धर्म का मर्म
कषाय घटें, करुणा बढ़े
जैन धर्म का मर्म : कषाय घटें, करुणा बढ़े
धार्मिक क्रियाएँ हमारे जीवन में श्रद्धा और अनुशासन का स्थान बनाती हैं। उनका गहरा अर्थ तब खुलता है, जब हम पूछते हैं—इनसे मेरे स्वभाव में क्या बदल रहा है? सामायिक के बाद क्या मैं असहमति को अधिक शांत मन से सुन पाता हूँ? उपवास के बाद क्या मेरी वाणी में संयम आया है? दान के बाद क्या संग्रह की इच्छा कुछ कम हुई है?
जैन धर्म हमें अपने चार कषाय—क्रोध, मान, माया और लोभ—पहचानने का अभ्यास कराता है। इन्हीं के प्रभाव में हम कभी किसी से कटु बोलते हैं, कभी अपना लाभ छिपाकर रखते हैं, तो कभी प्रशंसा पाने के लिए किया गया अच्छा काम भी अहंकार का विषय बन जाता है। मन, वचन और काया को सजग बनाने की साधना नए कर्मबंध को रोकने की दिशा है; तप और आत्मशुद्धि का अभ्यास बँधे कर्मों की निर्जरा से जुड़ता है।
अहिंसा इस साधना का हृदय है। किसी का बुरा चाहना, उसके साथ हुए अन्याय पर प्रसन्न होना, चुगली करना या झूठा कलंक लगाना—ये सब हमें अपने भाव और व्यवहार पर विचार करने को कहते हैं। द्वेष उठता है तो सबसे पहले हमारा समभाव प्रभावित होता है; कटु वाणी और कर्म से दूसरे को भी चोट पहुँच सकती है। इसलिए जैन अहिंसा भीतर की सजगता के साथ दूसरे जीवों की रक्षा, करुणा और सावधान आचरण भी माँगती है। किसी की सहायता करना इसी अहिंसा की मूल्यवान अभिव्यक्ति है।
दान, शील, तप और भावना की चर्चा भी हमें क्रिया के साथ उसके उद्देश्य की ओर ले जाती है। किसी ज़रूरतमंद की मदद के लिए दिया गया दान अपना अच्छा काम करता है। यदि उसी समय मन में यह इच्छा उठे कि लोग मुझे सबसे बड़ा दानी कहें, तो उस मान की चाह को भी देखना होगा। सेवा का महत्व बना रहता है; साधक के लिए अपने अहंकार को पहचानने का एक और अवसर खुलता है। तप के साथ सम्मान की अपेक्षा उठे, तब भी यही प्रश्न सामने आता है—मैंने किस इच्छा को छोड़ा और किसे पकड़ लिया?
जैन धर्म की बाहरी क्रियाएँ हमें रुकने, देखने और अभ्यास करने का समय देती हैं। उन्हें आचरण से जोड़ना हमारा पुरुषार्थ है। जितना क्रोध घटेगा, क्षमा के लिए उतनी जगह बनेगी। जितना लोभ समझ में आएगा, अपरिग्रह का संकल्प उतना स्पष्ट होगा।
कभी-कभी मैं इस शिक्षा को एक वाक्य में कहता हूँ—‘स्व का अर्थी बनो।’ अपने भीतर की चेतना को जानो और अपना वास्तविक हित समझो। शरीर, परिवार और संपत्ति की देखभाल जीवन की जिम्मेदारियाँ हैं; इनके बीच अपने भावों को देखना भी आवश्यक है। आत्मकल्याण की यह दृष्टि हमें दूसरे जीवों से दूर नहीं करती। जैन सूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ हमें परस्पर सहयोग की भी याद दिलाता है।
शरीर इस यात्रा में हमारा साथी है। उसे साधना का साधन मानकर उसकी उचित देखभाल करें। शरीर की ज़रूरतों को समझते हुए हम उससे जुड़ी आसक्तियों पर भी विचार कर सकते हैं। हमारा प्रश्न तब यह होगा—क्या सारी शक्ति केवल सुविधा जुटाने में लग रही है, या ज्ञान, संयम और करुणा को बढ़ाने में भी?
अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज़’ सुनना मूल्यवान है। कई बार हम अपनी इच्छा को ही सही समझ बैठते हैं; इसलिए स्वाध्याय, गुरु से संवाद, दूसरों पर अपने कर्मों का प्रभाव देखना और प्रतिक्रमण करना भी जरूरी है। दिन के अंत में स्वयं से पूछें:
आज किसके साथ मैंने अन्याय किया?
कहाँ मुझे क्षमा माँगनी चाहिए?
कल मैं क्या सुधारूँगा?
जीवन के अंतिम क्षणों की प्रतीक्षा किए बिना आत्ममंथन आज से शुरू हो सकता है।
जो योग्यता और संपत्ति हमें मिली है, उसका एक अंश समाज और ज़रूरतमंद जीवों के हित में लगाना भी इसी यात्रा का हिस्सा है। जब अपनी भूल सुधारने का प्रयास दूसरों के प्रति दया बढ़ाता है, तब आत्मकल्याण और लोकहित एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
जैन धर्म का मर्म मेरे लिए यही सतत अभ्यास है—अपने कषायों को पहचानना, उन्हें घटाने का पुरुषार्थ करना और हर जीव के प्रति अधिक सावधान व करुणामय बनना।
जय महावीर!