जैन दर्शन
बंधन से मुक्ति और दृष्टि का विस्तार
जैन दर्शन : बंधन से मुक्ति और दृष्टि का विस्तार
किसी ने हमारी प्रशंसा की और मन चाहता है कि वह बात बार-बार सुनने को मिले। किसी ने आलोचना की और वही शब्द पूरे दिन भीतर चुभते रहते हैं। घटनाएँ कुछ क्षणों की थीं, पर मन उनसे बँधा रह गया। जैन दर्शन हमें इसी अनुभव से अपने भीतर देखने का रास्ता देता है: मुझे क्या बाँध रहा है, और मैं किसी बात को कितनी पूरी दृष्टि से देख रहा हूँ?
राग-द्वेष और कर्मबंध
जैन दर्शन आत्मा के शुद्ध स्वरूप और संसारी जीव की कर्मबंध अवस्था में भेद करता है। संसारी जीव अनादि काल से कर्मों से बँधा माना गया है। इस बंध के कारणों में मिथ्यादृष्टि, असंयम, प्रमाद, कषाय तथा मन-वचन-काया की गतिविधियाँ बताई गई हैं। राग और द्वेष को हम अपने अनुभव में पहचान सकते हैं: प्रिय वस्तु या प्रशंसा से ऐसा चिपकाव कि उसके बिना बेचैनी होने लगे, और अप्रिय बात या व्यक्ति के प्रति ऐसा विरोध कि मन बार-बार उसी में उलझे।
समभाव का अभ्यास इस उलझन को देखने से शुरू होता है। प्रशंसा मिले तो हम उसे सुनें, पर अपनी पूरी पहचान उस पर निर्भर न करें। आलोचना मिले तो उसमें सच कितना है, यह जाँचें; यदि सुधार की बात हो तो स्वीकार करें। इस तरह समता जीवन से भागना नहीं सिखाती। वह हमें अपनी प्रतिक्रिया चुनने की जगह देती है।
जैन दर्शन शुभ और अशुभ, दोनों प्रकार के कर्मबंध की बात करता है। इस तथ्य को समझाने के लिए सोने और लोहे की बेड़ियों का उदाहरण दिया जाता है: दोनों बाँधती हैं, भले उनका अनुभव अलग हो। इसका अर्थ पुण्य और पाप को नैतिक रूप से समान मानना नहीं है। हिंसा और छल के परिणाम करुणा और सेवा के परिणामों से भिन्न हैं। अहिंसा, सहायता और सदाचार को जीवन में अपनाना आवश्यक है। अंतिम मोक्ष की दृष्टि से, आत्मा को समस्त कर्मबंध से मुक्त होना होता है—शुभ कर्मबंध से भी।
स्वर्ग के अनुकूल अनुभव भी जैन दृष्टि में कर्मफल और जन्म-मरण के संसार के भीतर हैं। मोक्ष उस चक्र से पूर्ण मुक्ति है। भगवान महावीर ने तीर्थंकर के रूप में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र का मार्ग बताया; उसमें नए कर्मों के प्रवाह को रोकने की साधना संवर और बँधे कर्मों के क्षय की साधना निर्जरा है। मुक्ति का विचार अन्य भारतीय परंपराओं में भी मिलता है। जैन दर्शन कर्मबंध और उससे मुक्ति की अपनी विशिष्ट व्याख्या प्रस्तुत करता है।
अनेकांत : मेरी दृष्टि कितनी पूरी है?
राग-द्वेष हमें अपने भावों से बाँधते हैं; एकांगी आग्रह कभी-कभी हमें अपनी राय से बाँध लेता है। जैन दर्शन का अनेकांत याद दिलाता है कि किसी वस्तु या घटना के अनेक पक्ष हो सकते हैं। सामान्य मनुष्य एक समय में कुछ पक्ष जानता है; अपनी सीमित जानकारी को ही पूरा सत्य मान लेने पर विवाद बढ़ता है।
पाँच व्यक्तियों को आँखें ढँककर एक हाथी को छूने दिया जाए। पूँछ छूने वाला उसे रस्सी जैसा कहेगा, पैर छूने वाला खंभे जैसा, सूँड़ छूने वाला साँप जैसा, कान छूने वाला सूप जैसा और शरीर छूने वाला दीवार जैसा। प्रत्येक व्यक्ति ने हाथी के एक हिस्से का अनुभव किया। “हाथी की पूँछ रस्सी जैसी है” कहना उसके अनुभव को ठीक स्थान देता है; “पूरा हाथी ही रस्सी है” कहना उस अनुभव को आवश्यकता से अधिक फैला देता है।
अनेकांत का अर्थ यह नहीं कि हर विचार बिना जाँच सही है। वह हमें यह स्पष्ट करने को कहता है कि कोई कथन किस दृष्टि, परिस्थिति और संदर्भ मेंसही है। इसी सावधानी को भाषा में व्यक्त करने की पद्धति स्याद्वाद है। इसमें ‘स्यात्’ कथन को किसी अपेक्षा या दृष्टि से जोड़ता है। इसकी सात अभिव्यक्तियाँ, जिन्हें सप्तभंगी कहते हैं, इस प्रकार हैं:
- किसी दृष्टि से है।
- किसी दृष्टि से नहीं है।
- भिन्न दृष्टियों से है और नहीं है।
- किसी दृष्टि से अवक्तव्य है—एक सीधे कथन में पूरा व्यक्त नहीं किया जा सकता।
- किसी दृष्टि से है और अवक्तव्य है।
- किसी दृष्टि से नहीं है और अवक्तव्य है।
- किसी दृष्टि से है, नहीं है और अवक्तव्य है।
इन कथनों में “है” और “नहीं है” एक ही वस्तु के बारे में एक ही समय और एक ही अर्थ में किया गया विरोधाभासी दावा नहीं हैं। दृष्टि या संदर्भ बदलने पर कथन का अर्थ बदलता है। यह अभ्यास हमें अपने शब्द अधिक सटीक रखने और दूसरे की बात अधिक ध्यान से सुनने के लिए प्रेरित करता है।
आज का आत्म-प्रयोग
महावीर का दर्शन पढ़ने के बाद आज हम दो छोटे प्रयोग कर सकते हैं।
पहला—प्रशंसा या आलोचना मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया देखें: क्या मैं उससे चिपक रहा हूँ या उसे समझ रहा हूँ?
दूसरा—किसी असहमति में उत्तर देने से पहले पूछें: सामने वाला किस अनुभव और किस दृष्टि से बोल रहा है?
एक प्रयोग हमें समता की ओर ले जाता है, दूसरा अनेकांत की ओर। दोनों मिलकर याद दिलाते हैं कि आत्मविजय की यात्रा अपने भीतर की पकड़ ढीली करने और सत्य को अधिक व्यापक दृष्टि से देखने से आगे बढ़ती है।
जय महावीर!