जैन धर्म का अर्थ : जिन की विजय, हमारा आत्म-प्रयास
जिन के गुणों को नमन करने के साथ उन्हें अपने आचरण में उतारने का प्रयास ही मेरे लिए जैन धर्म का जीवंत अर्थ है।
जैन धर्म का अर्थ : जिन की विजय, हमारा आत्म-प्रयास
‘जैन’ शब्द ‘जिन’ से बना है और ‘जिन’ का मूल अर्थ है—विजेता। यह विजय किसी दूसरे व्यक्ति या राज्य पर नहीं है। जैन परंपरा में जिन उन्हें कहा जाता है, जिन्होंने क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय पाई और केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके दिखाए मार्ग पर चलने वाले जैनकहलाते हैं।
यह अर्थ मुझे बार-बार अपने जीवन की ओर लौटाता है। मैं दूसरों से कितनी बार जीता, उससे अधिक आवश्यक प्रश्न है—मैंने अपने क्रोध, अहंकार और लोभ के सामने कितनी बार स्वयं को संभाला?
जैन धर्म मुझे इसलिए प्रिय है कि वह आत्मकल्याण का दायित्व मेरे अपने पुरुषार्थ से जोड़ता है। जैन तत्त्वदर्शन प्रत्येक द्रव्य की अपनी सत्ता और गुण मानता है। इस दृष्टि से मैं अपनी शांति की पूरी जिम्मेदारी दूसरों की प्रशंसा, स्वीकृति या कृपा पर नहीं डाल सकता। परिवार और समाज का स्नेह मेरे लिए मूल्यवान है; फिर भी अपने भावों को समझना और अपना आचरण सुधारना मेरा काम है।
जैन दर्शन के अनुसार जगत का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। कर्म का सिद्धांत हमें अपने विचारों और कर्मों के प्रति सजग करता है। इसका उपयोग किसी दुःखी व्यक्ति के जीवन का फैसला सुनाने के लिए नहीं होना चाहिए। इससे मुझे सबसे पहले अपने बारे में पूछना है—आज मैंने किन भावों से काम किया और आगे क्या बदल सकता हूँ?
यहीं से तीर्थंकरों के त्याग को समझने का प्रश्न उठता है। जिन्होंने आसक्ति छोड़ी, उनकी आराधना करते समय मेरे भीतर संग्रह और सम्मान की चाह कितनी घट रही है? प्रतिमा के सामने झुकते हुए क्या मेरा अहंकार भी थोड़ा झुकता है? यदि मैं उनकी प्रतिमा पर मुकुट चढ़ाऊँ, तो क्या अपने सिर से मान का बोझ उतारने का भी प्रयास करता हूँ?
जैन समाज में प्रतिमा और मंदिर को लेकर अलग-अलग परंपराएँ हैं। अनेक लोगों के लिए प्रतिमा वीतराग के गुणों का स्मरण कराती है; दूसरे बिना प्रतिमा के ध्यान और आत्मसाधना को महत्व देते हैं। इन मतों के बीच भी आत्मचिंतन का प्रश्न साझा रह सकता है: मेरी आराधना मुझे कितना वीतराग बना रही है?
धार्मिक कार्यक्रमों में लगने वाली बोलियों और दिए जाने वाले दान से धर्मशालाएँ, भोजनशालाएँ तथा समाजोपयोगी सुविधाएँ बनती हैं। इन कार्यों का अपना महत्व है। साथ ही दान देते समय अपने भाव को देखना भी जरूरी है। मैं सहायता के लिए दे रहा हूँ, या नाम और सम्मान पाने की इच्छा मुझे आगे बढ़ा रही है? यदि ऊँची बोली को ही धर्म का माप मान लिया जाए, तो शांत भाव से सेवा करने वाला व्यक्ति हमारी दृष्टि से ओझल हो सकता है।
जैन धर्म का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र को साथ लेकर चलता है। इसलिए मेरी श्रद्धा का प्रभाव मेरे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए—घर में क्षमा, व्यापार में सत्य, वाणी में अहिंसा और उपलब्ध साधनों के उपयोग में मर्यादा। यही वे स्थान हैं जहाँ मैं प्रतिदिन स्वयं को परख सकता हूँ।
‘जैन’ कहलाना मुझे जिन की विजय की याद दिलाता है। जब किसी अपमान पर क्रोध उठे और मैं उत्तर देने से पहले ठहर सकूँ, जब लाभ के अवसर पर भी सत्य का साथ दूँ, जब सम्मान मिलने पर विनम्र रहूँ—तब मैं उस मार्ग पर एक छोटा-सा कदम बढ़ाता हूँ।
जिन के गुणों को नमन करने के साथ उन्हें अपने आचरण में उतारने का प्रयास ही मेरे लिए जैन धर्म का जीवंत अर्थ है।
जय महावीर!