जैन विचारधारा
आत्मविजय से मोक्षमार्ग तक
जैन विचारधारा : आत्मविजय से मोक्षमार्ग तक
भगवान महावीर के सामने हाथ जोड़ते समय मेरे मन में एक प्रश्न उठता है—मैं उनसे क्या चाहता हूँ? किसी इच्छा की पूर्ति, या उनके जीवन से अपने जीवन को बदलने की प्रेरणा?
जैन विचारधारा का उत्तर आत्म-प्रयास में मिलता है। वर्धमान ने तप और संयम का मार्ग स्वयं साधा; महावीर का जीवन हमें अपनी चेतना और आचरण पर काम करने की संभावना दिखाता है। यह यात्रा अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और तप को समझने से शुरू होती है।
अहिंसा का अभ्यास मन, वचन और काया—तीनों में होता है। कई बार हिंसा का बीज पहले हमारे भीतर उठता है: किसी के प्रति द्वेष, उसे नीचा दिखाने की इच्छा या अपने क्रोध को उचित ठहराने का विचार। इसलिए अहिंसा हमें बाहरी व्यवहार के साथ अपने भावों को भी देखने को कहती है। किसी जीव को कष्ट न पहुँचाने की सावधानी और किसी मनुष्य से कटु वचन न बोलने का प्रयास, दोनों उसी साधना के हिस्से हैं।
अपरिग्रह गृहस्थ से अपनी सारी आवश्यकताएँ छोड़ देने को नहीं कहता। वह पूछता है—मेरे लिए कितना पर्याप्त है? वस्तुएँ उपयोग के लिए हैं; यदि उनका संग्रह ही मेरी पहचान बन जाए, तो उन्हें छोड़ने का विचार भी बेचैन कर देगा। संसार में उतना जुड़ना कि अपने दायित्व निभा सकें और आवश्यकता पड़ने पर किसी वस्तु, सुविधा या प्रतिष्ठा से पीछे हट सकें—यह अपरिग्रह का व्यावहारिक अभ्यास है।
संयम हमारे विचार, वाणी, भोजन और कर्म को दिशा देता है। इच्छा उठते ही उसके पीछे चल पड़ना अनिवार्य नहीं। एक क्षण ठहरकर हम देख सकते हैं कि जो करने जा रहे हैं, वह आवश्यक है या केवल पुरानी आदत का आग्रह।
तप में उपवास का स्थान है, पर जैन परंपरा अंतरंग तप की भी बात करती है—प्रायश्चित्त, विनय, सेवा, स्वाध्याय, आसक्ति छोड़ने का अभ्यास और ध्यान। तप के दौरान शरीर की क्षमता का ध्यान रखना और अपने भावों को देखना आवश्यक है। यदि भोजन छोड़ने के साथ क्रोध और अहंकार को पहचानने का प्रयास भी हो, तो साधना जीवन के अधिक निकट आती है।
अवतार और तीर्थंकर : दो अलग दृष्टियाँ
हिन्दू धर्म की कुछ परंपराओं, विशेषकर वैष्णव परंपरा में, अवतार ईश्वरीय सत्ता के जगत में प्रकट होने की धारणा है। जैन दर्शन सृष्टिकर्ता ईश्वर के अवतरण की धारणा को स्वीकार नहीं करता। यहाँ प्रेरणा का केंद्र वह आत्मा है जो अपने पुरुषार्थ से कर्मावरण क्षीण करती है और केवलज्ञान प्राप्त करती है।
ऐसी केवलज्ञानी, देहधारी आत्मा अरिहंत कहलाती है। अरिहंतों में तीर्थंकर वे हैं जो साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका के चतुर्विध संघ के लिए धर्मतीर्थ स्थापित करते हैं—भवसागर से पार होने का मार्ग सुलभ कराते हैं। जीवन के अंत में शेष कर्मों का पूर्ण क्षय होने पर अरिहंत सिद्ध होते हैं। इस क्रम में तीर्थंकर को पहले से सिद्ध मान लेना ठीक नहीं होगा; सिद्ध अवस्था उनकी अंतिम, कर्ममुक्त अवस्था है।
मेरे लिए इस विचार की गहरी प्रेरणा है: जिनके गुणों को मैं नमन करता हूँ, उन्होंने भी साधना का मार्ग अपनाया। उनकी वंदना मुझे अपने पुरुषार्थ से विमुख करने के बजाय उसकी याद दिला सकती है।
कर्म का सिद्धांत और मनुष्य जीवन
जैन दर्शन के अनुसार जगत अनादि है और उसका कोई सृष्टिकर्ता नहीं। वह जीव, पुद्गल, आकाश, काल, धर्म और अधर्म—छह द्रव्यों की बात करता है। यहाँ द्रव्य के रूप में धर्म और अधर्म का अर्थ नैतिक अच्छा-बुरा नहीं, बल्कि क्रमशः गति और स्थिति के माध्यम से है।
जैन कर्मदर्शन आत्मा को अपने भावों और कर्मों के प्रति उत्तरदायी बनाता है। इसके आधार पर किसी दुःखी व्यक्ति के पूर्वकर्मों का निर्णय सुनाना हमारे वश में नहीं है। मेरे लिए अधिक उपयोगी प्रश्न यह है: आज की परिस्थिति में मैं कौन-सा भाव चुनूँ और कैसा कर्म करूँ? अनुकूलता में अहंकार से बचना और प्रतिकूलता में पुरुषार्थ बनाए रखना इसी प्रश्न के दो रूप हैं।
स्वर्ग के देव भी जैन दृष्टि में कर्म और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त सिद्ध आत्माएँ नहीं हैं। इसीलिए मनुष्य जीवन को साधना का मूल्यवान अवसर माना गया है। इसे केवल भोग में बिताने के बजाय हम ज्ञान, करुणा और संयम को विकसित करने में लगा सकते हैं।
मोक्षमार्ग के तीन साथ चलने वाले सूत्र
तत्त्वार्थसूत्र कहता है—“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः”; अर्थात सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र मिलकर मोक्षमार्ग हैं।
सम्यग्दर्शन का आशय तत्त्वों को समझकर उन पर यथार्थ श्रद्धा रखना है। इसका अर्थ केवल यह घोषणा कर देना नहीं कि मेरा अपना धर्म ही सच्चा है।
सम्यग्ज्ञान तत्त्वों का सही ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न है। इसमें अध्ययन के साथ प्रश्न करना, अर्थ समझना और भ्रम दूर करना भी शामिल है। गुरु और आगम इस यात्रा में मार्गदर्शक हैं; उनकी शिक्षा को समझकर जीवन में उतारना साधक का काम है।
सम्यक्चरित्र उस समझ के अनुसार आचरण है। अहिंसा के बारे में जानने के बाद वाणी में सावधानी आना, अपरिग्रह को समझने के बाद संग्रह की सीमा तय करना और भूल पहचानने के बाद उसे सुधारना—यहीं ज्ञान जीवन बनता है।
जैन दर्शन में मोक्ष आत्मा की समस्त कर्मबंध से पूर्ण मुक्ति है। उस सिद्ध अवस्था में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य का वर्णन किया गया है। यह ऊँचा लक्ष्य मुझे आज के छोटे प्रयासों से अलग नहीं करता। क्रोध के क्षण में ठहरना, किसी जीव के प्रति सावधान होना और अपनी भूल स्वीकार करना भी उसी दिशा में मेरे वर्तमान कदम हैं।
जब मैं महावीर को नमन करूँ, तो अपने आप से इतना पूछ सकूँ—आज मैंने किस इच्छा को समझा, किस जीव के प्रति अधिक सावधानी रखी और किस संबंध में अपना अहंकार थोड़ा कम किया?
यहीं से वर्धमान की यात्रा मेरी यात्रा को दिशा देती है। आत्मकल्याण का यह प्रयास जब दूसरों के प्रति करुणा और जिम्मेदारी बढ़ाता है, तब उसका प्रभाव मेरे भीतर से आगे भी पहुँचता है।
जय महावीर!