क्षमा
यदि शब्दों ने क्षमा माँग ली, किंतु अहंकार ने अपनी गलती स्वीकार नहीं की; यदि हमने सबको “मिच्छामि दुक्कडम्” कहा, लेकिन किसी एक व्यक्ति का नाम आते ही भीतर क्रोध जाग उठा—तो क्षमापना अभी हमारे व्यवहार तक पहुँची है, चेतना तक नहीं।

द राइजिंग स्टेप, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका क्षमायाचना विशेषांक सितंबर 2026 पेज 14-16
“मिच्छामि दुक्कडम्।”
ये शब्द अत्यंत पवित्र हैं। लेकिन इनकी वास्तविक शक्ति केवल इनके उच्चारण में नहीं, उस आंतरिक परिवर्तन में है जो इनके साथ घटित होना चाहिए। यदि शब्दों ने क्षमा माँग ली, किंतु अहंकार ने अपनी गलती स्वीकार नहीं की; यदि हमने सबको “मिच्छामि दुक्कडम्” कहा, लेकिन किसी एक व्यक्ति का नाम आते ही भीतर क्रोध जाग उठा—तो क्षमापना अभी हमारे व्यवहार तक पहुँची है, चेतना तक नहीं।
क्षमा माँगना कई बार सरल होता है; स्वयं को बदलना कठिन होता है। औपचारिक रूप से यह कह देना सहज है कि “जाने-अनजाने कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें।” कठिनाई तब आती है, जब हमें किसी निश्चित घटना और अपनी स्पष्ट भूल को स्वीकार करना पड़े। सच्ची क्षमा सामान्य शब्दों के पीछे छिपती नहीं; वह अपने उत्तरदायित्व को पहचानती है। उसमें स्पष्टीकरण कम और आत्मस्वीकार अधिक होता है। जब हम अपनी भूल स्वीकार करते हैं, तब हम छोटे नहीं होते। वास्तव में उसी क्षण हमारा अहंकार छोटा और हमारी चेतना बड़ी होती है। क्षमा इसलिए वीरों का आभूषण कही गई है, क्योंकि प्रतिशोध के लिए केवल आवेश चाहिए, जबकि क्षमा के लिए आत्मबल चाहिए।
क्षमा दूसरे पर किया गया उपकार नहीं है
हम प्रायः कहते हैं—“मैंने उसे क्षमा कर दिया।”
इस वाक्य में भी कभी-कभी एक सूक्ष्म अहंकार छिपा होता है, मानो हम किसी दोषी पर उपकार कर रहे हों। लेकिन क्षमा का पहला लाभ सामने वाले को नहीं, हमें मिलता है। जिस व्यक्ति के प्रति हम क्रोध रखते हैं, वह संभव है अपनी दिनचर्या में सामान्य रूप से व्यस्त हो; किंतु उसकी स्मृति हमारे भीतर बार-बार वही पीड़ा उत्पन्न करती रहती है। घटना एक बार घटी थी, पर स्मृति उसे अनेक बार दोहराती है। इस प्रकार दूसरे की एक भूल की सजा हम स्वयं को प्रतिदिन देते रहते हैं। क्षमा स्मृति को मिटाना नहीं; स्मृति में भरे विष को निकालना है। यह दूसरे को दोषमुक्त करने से पहले स्वयं को द्वेष से मुक्त करने की प्रक्रिया है।
महावीर की क्षमा : पीड़ा देने वाले के प्रति भी करुणा
भगवान महावीर के साधना-काल में अनेक घोर उपसर्ग आए। परंपरा में संगम देव द्वारा दिए गए दीर्घ और असह्य कष्टों का प्रसंग मिलता है। महावीर ने उन कष्टों को केवल शारीरिक धैर्य से सहन नहीं किया; उनके अंतर्मन में पीड़ा देने वाले के प्रति भी प्रतिशोध उत्पन्न नहीं हुआ। कथा के अनुसार, जब संगम देव लौटने लगा, तब महावीर के नेत्रों में करुणा के अश्रु थे। वे अश्रु अपनी वेदना के कारण नहीं, बल्कि इस भाव से थे कि अज्ञानवश उन्हें कष्ट पहुँचाते हुए संगम ने स्वयं अपने लिए कितने कर्मबंध कर लिए।
सामान्य मनुष्य पीड़ा देने वाले को शत्रु के रूप में देखता है। महावीर ने उसके भीतर अज्ञान, आवेश और कर्मबंधन से पीड़ित एक जीव को देखा। यही क्षमा की पराकाष्ठा है—जहाँ प्रतिशोध समाप्त हो जाता है और कष्ट देने वाले के आत्मकल्याण की चिंता जन्म लेती है।
महावीर की दृष्टि हमें सिखाती है कि दूसरे की हिंसा को अपने भीतर की हिंसा बनने से रोक देना भी अहिंसा है। किसी ने हमारे साथ कटु व्यवहार किया; यदि उसके उत्तर में हमने अपने भीतर घृणा को स्थायी निवास दे दिया, तो उसकी हिंसा हमारी चेतना में प्रवेश कर गई, क्षमा उस प्रवेश-द्वार को बंद करती है।
क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं
क्षमा को समझते समय एक अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है। क्षमा का अर्थ यह नहीं कि हम अन्याय को उचित मान लें, अपराध को छिपाएँ, अपमानजनक व्यवहार सहते रहें अथवा बिना परिवर्तन के उसी अस्वस्थ संबंध में लौट जाएँ। क्षमा, न्याय और पुनः संबंध स्थापित करना—तीनों अलग विषय हैं। न्याय सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता है। अनुचित व्यवहार को रोकना हमारा उत्तरदायित्व हो सकता है। किसी संबंध में स्वस्थ सीमाएँ निर्धारित करना भी आवश्यक हो सकता है। क्षमा इन सबका निषेध नहीं करती।
क्षमा केवल इतना कहती है—
- “मैं न्याय की माँग करूँगा, लेकिन प्रतिशोध की आग में स्वयं को नहीं जलाऊँगा।”
- “मैं अनुचित व्यवहार से दूरी रख सकता हूँ, लेकिन अपने भीतर स्थायी घृणा नहीं पालूँगा।”
- “मैं सावधान रहूँगा, किंतु द्वेष का बंदी नहीं बनूँगा।”
क्षमा विवेकहीन समझौता नहीं; चेतना की स्वतंत्रता है।
क्षमा के तीन आयाम
सच्ची क्षमापना तीन दिशाओं में घटित होती है।
पहली दिशा है—अपनी भूल के लिए क्षमा माँगना। इसमें अपनी गलती को बिना किसी बहाने के स्वीकार करने का साहस चाहिए।
दूसरी दिशा है—दूसरे को क्षमा करना। इसमें पुरानी घटना को बार-बार दोहराकर स्वयं को पीड़ित करते रहने की मानसिक प्रवृत्ति से मुक्त होना पड़ता है।
तीसरी और कई बार सबसे कठिन दिशा है—स्वयं को क्षमा करना।
जो मनुष्य अपनी भूल को पहचानकर प्रायश्चित्त करता है, उससे सीखता है और अपने आचरण को बदलता है, उसे जीवनभर अपराधबोध में जलते रहना आवश्यक नहीं। स्वयं को क्षमा करना अपनी भूल को छोटा करना नहीं; उस भूल से बड़ा बनने का संकल्प है। इस क्षमापना दिवस पर किसी एक ऐसे व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से लिखें या फोन करें, जिसके साथ संबंध में वास्तविक दूरी आई है। यह न लिखें—“यदि आपको बुरा लगा हो तो क्षमा करें।”
इसके स्थान पर कहें—
- “मेरे व्यवहार से आपको पीड़ा पहुँची, इसका मुझे बोध है।”
- “उस समय मैं आपकी स्थिति को नहीं समझ पाया।”
- “मैं अपनी भूल स्वीकार करता हूँ और उसे दोहराने से बचने का प्रयास करूँगा।”
- “क्या हम इस संबंध को अधिक संवेदनशीलता के साथ पुनः देख सकते हैं?”
क्षमा माँगने का उद्देश्य केवल अपने मन का बोझ हल्का करना नहीं होना चाहिए। उसमें सामने वाले की पीड़ा सुनने की तत्परता भी होनी चाहिए। संभव है वह व्यक्ति तत्काल हमें क्षमा न कर पाए। उसके निर्णय और समय का सम्मान करना भी हमारी क्षमापना का हिस्सा है। जैन परंपरा की यह प्रार्थना इसी विराट मैत्रीभाव की घोषणा है—
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणइ॥
मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी जीवों के प्रति मेरी मैत्री है, मेरा किसी से वैर नहीं है। जब यह भाव केवल हमारे होंठों पर नहीं, संबंधों और निर्णयों में उतरता है, तभी क्षमापना दिवस अपनी वास्तविक सार्थकता प्राप्त करता है। आइए, इस वर्ष हम केवल क्षमा का संदेश न भेजें—किसी संबंध को मुक्त करें। केवल परंपरा न निभाएँ—अपनी चेतना की दिशा बदलें। क्योंकि— क्षमा दूसरे को दिया गया दान नहीं, स्वयं को दी गई मुक्ति है।
मिच्छामि दुक्कडम्।
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