महावीर दर्शनपरम्परा से प्रज्ञा की ओर

विवेकपूर्ण चर्चाविकास जैन

अंग्रेज चले गए। हमारे भीतर का दरबार कब जाएगा?

जहाँ विवेक गिरवी है, वहाँ दरबार जीवित है।

महावीर जीवन का विज्ञान - आत्मकल्याण से विश्वकल्याण तक की यात्रा

(एक विनम्र निवेदन: यह लेख किसी के समर्थन या विरोध के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन में विवेक, आत्मसम्मान तथा जिम्मेदारी का बोध जगाना है। यह स्वयं को, अपने परिवार को और अपने समाज को अधिक विवेकशील एवं जागरूक बनाने का आत्मीय आग्रह है। इसे खुले मन से स्वयं भी पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करें। चर्चा की शुरुआत इस प्रश्न से करें—इन बातों में हमें अपने भीतर क्या सुधारने की आवश्यकता दिखाई देती है?)

भारत को विदेशियों ने गुलाम बनाया—यह इतिहास है। लेकिन वे ऐसा कर कैसे सके—यह वह प्रश्न है, जिसे पूछते ही हमारा गौरव असहज होने लगता है।

हम आक्रांताओं और अंग्रेजों की क्रूरता पर घंटों बोल सकते हैं, लेकिन अपने भीतर की कमजोरियों पर कुछ मिनट सुनना भी हमें अपमान लगता है। हमें अपनी पराजय का खलनायक चाहिए; स्वयं का आत्मपरीक्षण करने का साहस हम कम ही जुटाते हैं।

औपनिवेशिक लूट और अत्याचार की जिम्मेदारी औपनिवेशिक शासकों की थी। हमारी कमजोरियाँ उनके अपराधों का औचित्य नहीं बन सकतीं। लेकिन उनके अपराध गिनाते रहने से हमारी कमजोरियाँ भी समाप्त नहीं हो जातीं।

इसलिए इतिहास को ईमानदारी से पढ़ना होगा।

ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं का बड़ा हिस्सा भारतीय सैनिकों से बना था। विदेशी सत्ता को यहाँ पैर जमाने के लिए केवल समुद्र पार से आए लोगों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि बाहर से कौन आया। प्रश्न यह भी है कि यहाँ उसे किसने सहारा दिया, किसने अपना स्वार्थ देखा और किसने अपने छोटे लाभ के लिए बड़े भविष्य को दाँव पर लगा दिया।

कभी-कभी पराधीनता का रास्ता उस दरवाजे से खुलता है, जिस पर भीतर से लिखा होता है—“मेरी कुर्सी बची रहनी चाहिए।”

राजाओं की प्रतिद्वंद्विताएँ, ईस्ट इंडिया कंपनी की सैन्य और आर्थिक शक्ति, छलपूर्ण राजनीतिक समझौते तथा विस्तारवादी नीतियाँ—इन सबने मिलकर औपनिवेशिक सत्ता का रास्ता बनाया। सहायक संधियों जैसी व्यवस्थाओं में शासक अपना राजपद बचाते हुए वास्तविक स्वतंत्रता खोते चले गए।

ऐसा भी नहीं कि भारत ने प्रतिरोध नहीं किया। संघर्ष हुए, विद्रोह हुए और असंख्य लोगों ने अपने प्राण दिए। उस साहस और बलिदान का सम्मान करते हुए भी हमें यह पूछना होगा कि प्रतिरोध को कमजोर करने वाले स्वार्थ और विभाजन पैदा कैसे हुए। स्वतंत्रता के लिए लड़ने वालों को याद रखना जितना आवश्यक है, पराधीनता को सहारा देने वाली मानसिकता को पहचानना भी उतना ही आवश्यक है।

क्योंकि वह मानसिकता अतीत के साथ समाप्त नहीं हो गई।

उसका स्वर आज भी सुनाई दे सकता है—मेरी प्रतिष्ठा बनी रहे, मेरा परिवार आगे रहे, मेरा पद सुरक्षित रहे; और यदि पद नहीं है तो किसी भी तरह मिल जाए। लोकतांत्रिक रास्ते से न मिले तो अराजकता से ही सही। इसके बदले संस्था कमजोर हो, समाज बँटे या देश का भविष्य दाँव पर लगे—तो लगता रहे।

इस मानसिकता को केवल अतीत की सामंतशाही समझना भूल होगी। वह हमारे लोकतंत्र में भी जीवित रह सकती है। उसके लिए सिंहासन जरूरी नहीं; ऐसा वातावरण पर्याप्त है जहाँ प्रभावशाली व्यक्ति से प्रश्न करना अपराध और उसकी प्रशंसा करना योग्यता बन जाए।

दरबार की पहचान मुकुट से नहीं होती। दरबार की पहचान इससे होती है कि वहाँ सत्य बोलने वाले की क्या दशा होती है।

जहाँ असहमति को विश्वासघात कहा जाए, जहाँ योग्यता से अधिक निकटता का मूल्य हो और जहाँ गलत निर्णय पर भी तालियाँ बजाना निष्ठा कहलाए—वहाँ दरबार मौजूद है। वह राजनीतिक दल में हो सकता है, धार्मिक संस्था में हो सकता है, किसी संत के आसपास हो सकता है, व्यापारिक संगठन में हो सकता है और हमारे अपने घर में भी हो सकता है।

चापलूसी राजनीति, समाज, परिवार और धर्म—सबको भीतर से कमजोर करती है। अधिकार रखने वाले लोग धीरे-धीरे वास्तविकता सुनने की क्षमता खोने लगते हैं। उन्हें बताया जाता है कि सब प्रसन्न हैं, सब ठीक है, उनके निर्णय अद्वितीय हैं और दोष हमेशा विरोधियों का है।

फिर एक दिन वास्तविकता दरवाजा तोड़कर भीतर आती है। तब दरबारी सबसे पहले नया दरबार खोजने निकल पड़ते हैं।

इसीलिए भारत के हर राजनीतिक दल से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि उसके भीतर स्वतंत्र विचार का कितना स्थान है। नेतृत्व तक पहुँचने का रास्ता काम और क्षमता से खुलता है या परिवार, निकटता और अनवरत प्रशंसा से?

लोकतांत्रिक आलोचना का अधिकार अपनी जगह है; विदेशी सत्ता से भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माँगना उससे अलग और गंभीर विषय है। राजनीतिक सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए—सत्ता की आकांक्षा रखने वाले किसी भी दल को देश के भविष्य का निर्णय बाहरी शक्तियों के हाथ में सौंपने का नैतिक अधिकार नहीं है।

लेकिन ऐसे सिद्धांतों की विश्वसनीयता तभी है जब हम उन्हें अपने पसंदीदा दल और नेता पर भी लागू करें।

अपने विरोधी की चापलूसी पहचान लेना आसान है। अपने समर्थन में छिपी चापलूसी पहचानना नागरिक साहस है।

यह साहस अचानक पैदा नहीं होता। उसकी नींव परिवार, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार में पड़ती है। दुर्भाग्य से दरबारी मानसिकता का प्रशिक्षण भी कई बार इन्हीं जगहों से शुरू हो जाता है।

बच्चा पूछता है—“ऐसा क्यों?”

उत्तर मिलता है—“बड़ों से बहस नहीं करते।”

युवा पूछता है—“इस दावे का प्रमाण क्या है?”

उत्तर मिलता है—“तुम्हारे भीतर श्रद्धा नहीं है। शास्त्रों में जो लिखा है, उस पर संदेह नहीं करते।”

वह फिर पूछता है—“यदि शास्त्रों की हर व्याख्या निर्विवाद है, तो एक ही धर्म के विभिन्न पंथों में इतना अंतर क्यों है?”

उत्तर मिलता है—“हमारे पंथ की व्याख्या सही है; दूसरे गलत समझते हैं।”

अनुयायी पूछता है—“क्या गुरु से भूल नहीं हो सकती? क्या उनसे प्रश्न पूछना गलत है?”

उत्तर मिलता है—“तुम गुरु पर संदेह करते हो। तुम धर्मविरोधी हो।”

सोचिए, जिस मनुष्य को जीवन भर प्रश्न पूछने पर अपराधबोध सिखाया गया हो, वह अन्याय के सामने निर्भीक होकर कैसे खड़ा होगा? जिसे हर प्रभावशाली व्यक्ति के सामने चुप रहना सिखाया गया हो, वह जिम्मेदार नागरिक बनने का साहस कहाँ से लाएगा?

हम समाज का दायित्व सँभालने के लिए विवेकशील युवा चाहते हैं। फिर उनके भीतर स्वतंत्र विचार विकसित करने के बजाय केवल आज्ञापालन की आदत क्यों डालते हैं?

यहीं धर्म की भूमिका का प्रश्न अत्यंत गंभीर हो जाता है।

जब किसी पीड़ित को समझाया जाता है कि सब भाग्य है, किसी अन्याय को पूर्वकर्म कहकर सह लेने की सलाह दी जाती है और हर विफलता को परमात्मा की इच्छा बताकर मानवीय जिम्मेदारी समाप्त कर दी जाती है, तब पूछना पड़ेगा—इस व्याख्या से लाभ किसे हो रहा है? पीड़ित को या उस व्यवस्था को, जिसे बदलना चाहिए था?

यदि हर घटना ईश्वर की इच्छा बताकर स्वीकार कर लेनी है, तो अन्याय रोकने का दायित्व कौन निभाएगा? यदि पुरुषार्थ का कोई अर्थ ही नहीं, तो शिक्षा, चिकित्सा, खेती, उद्योग और सुरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों का अर्थ क्या रह जाएगा?

आस्था मनुष्य को साहस दे सकती है। लेकिन उसकी ऐसी व्याख्या, जो पुरुषार्थ को निष्प्रभावी कर दे, समाज को कमजोर करेगी। कर्म की चर्चा यदि वर्तमान की जिम्मेदारी से मुँह मोड़ने का बहाना बन जाए, तो उस व्याख्या की समीक्षा आवश्यक है।

जैन समाज को भी इस आत्मपरीक्षण से छूट नहीं मिलनी चाहिए।

जिस दर्शन में आत्मसंयम और आत्मपरिवर्तन से मोक्ष का मार्ग खुलता है, जहाँ अनेकांत हमें अपनी दृष्टि की सीमाएँ समझने और दूसरे के दृष्टिकोण पर विचार करने की प्रेरणा देता है, वहाँ प्रश्नों के लिए तो और अधिक स्थान होना चाहिए।

ऐसे समाज में यदि कोई धर्मोपदेशक मंत्र-अनुष्ठान को व्यापार, प्रतिष्ठा, पद और सांसारिक सफलता की सुनिश्चित व्यवस्था बनाकर प्रस्तुत करे, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है—हम साधना करने आए हैं या अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अलौकिक अनुबंध करवाने?

यदि क्रोध उतना ही है, लोभ उतना ही है, छल उतना ही है, लेकिन अनुष्ठानों की संख्या बढ़ गई है, तो भीतर बदला क्या?

धर्म की सफलता हमारे आयोजन के आकार से कैसे तय होगी, जब हमारा अहंकार उससे भी बड़ा बना हुआ है?

मंत्र के विषय में भी यही बौद्धिक ईमानदारी चाहिए। जप किसी व्यक्ति के लिए एकाग्रता, अनुशासन और आत्मनिरीक्षण का अभ्यास हो सकता है। मंत्र-आधारित ध्यान पर कुछ शोधों में तनाव आदि में संभावित लाभ मिले हैं, लेकिन प्रमाणों की सीमाएँ भी हैं। इनसे यह सिद्ध नहीं होता कि कोई ब्रह्मांडीय व्यवस्था हमारी इच्छाओं को “डिकोड” करके बाहरी घटनाएँ बदल देती है या सिद्धियाँ प्रदान करती है।

“तरंग”, “ऊर्जा”, “फ्रीक्वेंसी” और “ब्रह्मांडीय कोड” जैसे शब्द इस्तेमाल करने भर से कोई आध्यात्मिक दावा वैज्ञानिक नहीं हो जाता।

दावा वैज्ञानिक है तो उसकी जाँच होगी, उसकी शर्तें स्पष्ट होंगी, परिणाम स्वतंत्र रूप से परखे जाएँगे और विफलता को भी स्वीकार किया जाएगा। यदि सफलता पर श्रेय अनुष्ठान का हो और असफलता पर दोष हमेशा साधक की श्रद्धा का, तो उस दावे की निष्पक्ष परीक्षा कैसे होगी?

आस्था की अपनी जगह है और वैज्ञानिक प्रमाण की अपनी कसौटी। दोनों के प्रति ईमानदारी जरूरी है।

यही ईमानदारी हमें अपनी सभ्यता के विषय में भी रखनी होगी। भारत की प्राचीनता हमारे लिए गौरव का विषय है, लेकिन प्राचीन होना अपने आप में आधुनिक क्षमता का प्रमाण नहीं है। पूर्वजों की उपलब्धियाँ प्रेरणा देती हैं; वे हमारी ओर से आज का अनुसंधान नहीं कर सकतीं।

पुरखों के ज्ञान का सबसे बड़ा सम्मान नया ज्ञान पैदा करना है।

जो समाज अपने अतीत की प्रतिभा का उत्सव मनाए, लेकिन वर्तमान की जिज्ञासा को दबाए, वह अपनी ही विरासत के साथ अन्याय करता है।

हमें पूछना होगा—हम अपने बच्चों को प्रयोग करने की स्वतंत्रता कितनी देते हैं? अपनी धारणा गलत सिद्ध होने पर उसे बदलने का साहस कितना सिखाते हैं? क्या हम उस युवा का सम्मान कर सकते हैं जो आदरपूर्वक कहे—“आपकी बात परंपरागत हो सकती है, लेकिन मैं उसका आधार समझना चाहता हूँ”?

सभ्यता की जीवंतता इसी उत्तर में दिखाई देगी।

हमारे धार्मिक आयोजनों में अनुशासन, संसाधन और संगठन की अद्भुत क्षमता दिखाई देती है। कल्पना कीजिए, इसी संकल्प का एक हिस्सा पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, छात्रवृत्तियों और समाजोपयोगी अनुसंधान को मिले तो कितना परिवर्तन हो सकता है। श्रद्धा की शक्ति तब और सार्थक होगी, जब वह मनुष्य की समझ, संवेदना और क्षमता भी बढ़ाएगी।

सच्चा गुरु अपने सामने झुके सिरों की संख्या से संतुष्ट कैसे हो सकता है? उसकी सार्थकता तो तब है जब उसके सान्निध्य में व्यक्ति अधिक विवेकशील, अधिक जिम्मेदार और भीतर से अधिक स्वतंत्र बने; जब शिष्य में अपने अनुभव से समझने और अपने निर्णय की जिम्मेदारी लेने की क्षमता विकसित हो।

जो मार्गदर्शन हमें हमेशा निर्भर बनाए रखे, उसकी समीक्षा करनी होगी। जो नेतृत्व हमारी प्रश्न करने की क्षमता से डरता हो, उसकी समीक्षा करनी होगी। जिस विश्वास को बचाने के लिए हमें बार-बार अपनी बुद्धि चुप करानी पड़े, उसके सामने ठहरकर सोचना होगा।

यह सब सुनना असुविधाजनक है, क्योंकि यहाँ दोष केवल आक्रांता, नेता, गुरु और व्यवस्था का नहीं रह जाता। यहाँ हमारी अपनी भूमिका भी सामने आती है।

हम किसे पुरस्कृत करते हैं—सत्य बोलने वाले को या हमें अच्छा महसूस कराने वाले को? काम करने वाले को या हमारी प्रशंसा करने वाले को? जिम्मेदारी सिखाने वाले को या चमत्कार का आश्वासन देने वाले को?

हम जिन आदतों को सम्मान देते हैं, वही धीरे-धीरे हमारे समाज का चरित्र बन जाती हैं।

भारत को मजबूत बनाना है तो परिवार और समाज के प्रत्येक सदस्य को भीतर से मजबूत बनाना होगा—इतना कि वह अपने प्रिय नेता से प्रश्न कर सके, अपने पूज्य गुरु से स्पष्टीकरण माँग सके और अपनी सबसे प्रिय धारणा को भी विवेक तथा प्रमाण की कसौटी पर रख सके।

इसके लिए न अपने इतिहास से घृणा करनी है, न अपनी संस्कृति से। इसके लिए उस आत्मसम्मान को जगाना है जो अपनी भूल स्वीकार करने से नष्ट नहीं होता, बल्कि उसे सुधारने से और मजबूत होता है।

अंग्रेज चले गए और भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो गया। यह स्वतंत्रता असंख्य बलिदानों की उपलब्धि है। लेकिन इसकी रक्षा के लिए शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टि, नैतिक साहस और नागरिक जिम्मेदारी को सामाजिक जीवन में केंद्रीय स्थान देना होगा। अन्यथा धर्म और देश के नाम पर स्वार्थ साधने वाले लोग जनता को अपनी जागीर समझते रहेंगे।

इसलिए अब हमें अपने भीतर उस आदमी से मिलना है, जो आज भी किसी शक्तिशाली के सामने अपना विवेक गिरवी रखकर कहता है— “आप बस प्रसन्न रहिए। सही और गलत हम आपके अनुसार तय कर लेंगे।”

जब तक यह आदमी हमारे समाज में सम्मानित है, तब तक स्वतंत्रता का काम अधूरा है।

देश की सीमाओं की रक्षा के साथ नागरिक के विवेक की रक्षा भी जरूरी है। क्योंकि जिस समाज में विवेक गिरवी रखा जाने लगे, वहाँ दरबार फिर सजने लगते हैं।

जिम्मेदार भारत 🇮🇳

विकसित भारत 🇮🇳

महावीर जीवन का विज्ञान - आत्मकल्याण से विश्वकल्याण तक की यात्रा

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