पर्युषण : पर्व नहीं, आत्मा में पुनः निवास
आगम की दृष्टि से पर्युषण का वास्तविक अर्थ—वर्षावास से आत्मसंयम, अहिंसा, प्रतिक्रमण और क्षमा तक यह भोजन से प्रारम्भ हो सकता है, लेकिन भोजन पर समाप्त नहीं होता। यह शरीर को अनुशासित करता है, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य चेतना को अनुशासित करना है।
पर्युषण आते ही जैन परिवारों के जीवन में अनेक परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। रसोई बदल जाती है। जमीकंद हट जाते हैं। भोजन की मर्यादाएँ बढ़ जाती हैं। उपवास, एकासन, आयंबिल, सामायिक और प्रतिक्रमण की संख्या बढ़ने लगती है। मंदिरों, उपाश्रयों और स्थानकों में धार्मिक गतिविधियाँ गहन हो जाती हैं।
यह सब पर्युषण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लेकिन प्रश्न यह है— क्या पर्युषण का उद्देश्य केवल यह है कि आठ दिनों के लिए हमारी थाली बदल जाए?
यदि पर्युषण समाप्त होने के बाद हमारी थाली तो पुनः सामान्य हो जाए, लेकिन साथ ही हमारा क्रोध, अहंकार, छल, लोभ, कटुता, प्रतिस्पर्धा, हिंसक भाषा और दूसरों के प्रति असंवेदनशीलता भी वैसे ही लौट आए—तो क्या हमने वास्तव में पर्युषण किया?
जैन आगमों की मूल चेतना की ओर लौटें तो पर्युषण इससे कहीं अधिक गहरी साधना दिखाई देता है।
यह भोजन से प्रारम्भ हो सकता है, लेकिन भोजन पर समाप्त नहीं होता।
यह शरीर को अनुशासित करता है, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य चेतना को अनुशासित करना है।
और शायद इसीलिए पर्युषण को समझने के लिए उसके आज के उत्सवी स्वरूप से लगभग ढाई हजार वर्ष पीछे उसकी आगमिक जड़ों तक जाना आवश्यक है।
पर्युषण शब्द आगम में कहाँ मिलता है?
सबसे पहले एक महत्वपूर्ण तथ्य।
जिसे आज सामान्यतः कल्पसूत्र कहा जाता है, उसका एक महत्वपूर्ण भाग वास्तव में दशाश्रुतस्कन्ध नामक छेदसूत्र का आठवाँ अध्ययन “पज्जोसवणाकप्प” — पर्युषणाकल्प है। इस पर्युषणाकल्प का अंतिम वाक्य भी इसे इसी नाम से संबोधित करता है—भगवान महावीर ने राजगृह के गुणशीलक चैत्य में “पज्जोसवणाकप्प” का पुनः-पुनः उपदेश किया। अर्थात् पर्युषण कोई बहुत बाद में गढ़ा गया शब्द नहीं है। इसकी आगमिक जड़ अत्यंत प्राचीन है। लेकिन यहाँ एक दूसरा तथ्य उतना ही महत्वपूर्ण है— प्राचीन पर्युषण का अर्थ आज के केवल आठ दिवसीय उत्सव से पूरी तरह समान नहीं था।
मूल आगमिक अर्थ : वर्षा में स्थिर होना
कल्पसूत्र के सामाचारी भाग में स्पष्ट उल्लेख है कि भगवान महावीर वर्षा ऋतु का एक मास और बीस रात्रियाँ बीत जाने पर पर्युषण प्रारम्भ करते थे। उनके बाद गणधरों, गणधर-शिष्यों, स्थविरों और आगे की श्रमण-परंपरा ने भी यही अनुशासन अपनाया। इसे निर्धारित समय से पहले प्रारम्भ किया जा सकता था, पर उसके बाद नहीं।
यहाँ “पर्युषण” मूलतः साधु-साध्वियों के वर्षावास की विशेष अनुशासन-व्यवस्था से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
कल्पसूत्र बताता है कि पर्युषण के दौरान मुनि-साध्वियों की यात्रा-सीमा घट जाती थी; वर्षा, जल, अंकुर, वनस्पति और सूक्ष्म जीवों को लेकर विशेष सावधानी बरती जाती थी। यहाँ तक निर्देश दिया गया कि वर्षा ऋतु में शौच आदि के स्थानों को बार-बार निरीक्षित किया जाए, क्योंकि इस काल में जीव, घास, बीज, फफूंद और अंकुर अधिक उत्पन्न होते हैं। इसलिए पर्युषण की पहली आगमिक शिक्षा है—गति कम करो, ताकि हिंसा कम हो। लेकिन इसे केवल शारीरिक गति तक सीमित समझना भी अधूरा होगा। बाहर का विहार कम करने का उद्देश्य भीतर की जागरूकता बढ़ाना था।
बाहर का विहार रुका—तो भीतर की यात्रा प्रारम्भ हुई
सामान्य परिस्थितियों में श्रमण एक स्थान से दूसरे स्थान तक विहार करते थे। वर्षा ऋतु में यही गति असंख्य नवजीवों, अंकुरों, वनस्पतियों और सूक्ष्म जीवों की हिंसा का कारण बन सकती थी।
इसलिए महावीर का समाधान यह नहीं था कि—“जीवन तो चलेगा, थोड़ी हिंसा होती है तो होने दो।”
बल्कि समाधान था— जहाँ जीवन अधिक संवेदनशील हो जाए, वहाँ मनुष्य अपनी सुविधा कम करे, यही अहिंसा की वास्तविक वैज्ञानिकता है।
पर्युषण की जड़ में इसलिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के प्रति बढ़ी हुई संवेदनशीलता है। आज हम अपने भोजन की सूची बदलते हैं; उसका मूल भाव भी यही होना चाहिए— ऐसा जीवन जियें जिसमें हमारी आवश्यकता के कारण दूसरे जीवन पर न्यूनतम आघात पड़े।
पर्युषण की आध्यात्मिक अवधारणा “आत्मा के समीप निवास”
“पर्युषण” संस्कृत/प्राकृत परंपरा में परि + वस्/उष् से समझाया जाता है। इसका सामान्य भाव है—समीप रहना, ठहरना, निवास करना। जैन व्याख्या में इसका आध्यात्मिक अर्थ लिया गया—अपनी आत्मा के समीप निवास करना।
अर्थात् सामान्य दिनों में चेतना विषयों, संबंधों, इच्छाओं, व्यापार, मान-अपमान और राग-द्वेष में बाहर की ओर दौड़ती रहती है; पर्युषण उस प्रवाह को मोड़कर स्वयं के भीतर लौटने का अवसर है। इसीलिए इसे केवल “त्योहार” कहना इसके अर्थ को छोटा कर देता है। अधिक उपयुक्त अर्थ होगा—आत्मा में ठहरने का पर्व।
यहीं ऐतिहासिक और आध्यात्मिक व्याख्या का भेद समझना आवश्यक है। कल्पनिर्युक्ति में पर्युषण के कई पर्याय दिए गए हैं—
पज्जोसमणाए अक्खराइं होंति उ इमाइं गोण्णाई…
परिवसणा पज्जुसणा पज्जोसवणा य वासवासो वा…
अर्थात् पर्युषण के लिए पज्जोसमणा, परिवसणा, पज्जुसणा, पज्जोसवणा, वासावास, प्रथमसमोसरण, ठवणा, जेट्ठोग्गह जैसे अनेक नाम प्रयुक्त हुए। कल्पसूत्र-चूर्णि भी इस परंपरा को विस्तार देती है और स्पष्ट करती है कि वर्षा के चार महीनों में एक ही क्षेत्र में रहना वासावास, एक स्थान पर निवास करना परिवसणा, और इस विशिष्ट वर्षाकालीन व्यवस्था को पज्जोसवणा कहा गया। बाद की टीका-परंपरा ने इन शब्दों के साधनात्मक अर्थ भी विकसित किए।
“पज्जोसमणा” को पर्युपशमना—अर्थात् कषायों और राग-द्वेष का उपशमन—के रूप में समझाया गया।
“परिवसणा” में केवल किसी नगर में रहने का अर्थ नहीं, बल्कि साधक के अपने वास्तविक स्वरूप में रहने का भाव भी देखा गया। और यहीं से पर्युषण की वह अत्यंत सुंदर आध्यात्मिक व्याख्या विकसित हुई— आत्मा के समीप निवास।
यह कहना अधिक प्रमाणिक होगा कि यह आगमिक साधना की टीकात्मक-दार्शनिक परिणति है; इसे मूल पर्युषणाकल्प के पहले सूत्र का शाब्दिक अनुवाद कहना उचित नहीं होगा। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह बाद की व्याख्या मूल आगमिक भावना के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसी का आंतरिक विस्तार है।
जब वर्षावास में श्रमण, बाहरी विहार छोड़कर आत्मसाधना के लिए एक स्थान पर ठहरते है तब आत्मसाधना प्रश्न करती है-
क्या शरीर का ठहर जाना ही पर्याप्त है? मन भी तो भटक रहा है।
आत्मसाधनाके इसी प्रश्न से बाहरी वर्षावास से आंतरिक पर्युषण प्रारम्भ होता है।
आचारांग : हिंसा का प्रश्न भोजन से बड़ा है
पर्युषण को समझने के लिए आचारांग सूत्र की अहिंसा-दृष्टि अत्यंत महत्वपूर्ण है। आचारांग का प्रसिद्ध सिद्धांत है कि सभी जीव जीवन चाहते हैं; सुख उन्हें प्रिय है और दुःख अप्रिय। एक प्रचलित पाठ इस प्रकार मिलता है—
सव्वे पाणा पियाउया, सुहसाया दुक्खपडिकूला…
सव्वेसिं जीवियं पियं।
भावार्थ— सभी प्राणियों को अपना जीवन प्रिय है। वे सुख चाहते हैं, दुःख से बचना चाहते हैं और जीवित रहना चाहते हैं।
एक अन्य आगमिक निर्देश है— सव्वे पाणा ण हंतव्वा…
अर्थात् जीवों की हिंसा नहीं करनी चाहिए। आचारांग की विस्तृत अहिंसा-व्यवस्था में मारना, मरवाना, पीड़ा देना, बंधन और उद्वेग उत्पन्न करना—सभी को संयम के क्षेत्र में रखा गया है।
यहीं से पर्युषण की व्याख्या व्यापक हो जाती है-
- यदि मैंने पर्युषण में जमीकंद छोड़ दिया, लेकिन अपनी वाणी से किसी व्यक्ति को घायल कर दिया—तो क्या मेरी अहिंसा पूर्ण हो गई?
- यदि मैंने रात्रिभोजन त्याग दिया, लेकिन किसी कर्मचारी का अपमान किया?
- यदि मैंने उपवास किया, लेकिन परिवार में किसी से वर्षों से बोलना बंद रखा?
- यदि मैंने हरी सब्जी नहीं खाई, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी मनुष्य को अपमानित करने में आनंद लिया?
तो आचारांग हमें भोजन से आगे देखने के लिए विवश करता है।
जैन अहिंसा केवल यह नहीं पूछती— “तुमने क्या खाया?”
वह यह भी पूछती है— “तुम्हारे कारण कौन पीड़ित हुआ?”
उत्तराध्ययन : सबसे कठिन विजय अपनी ही है
पर्युषण में बाहर के संसार को नियंत्रित करने से पहले अपने भीतर के संसार को देखना आवश्यक है।
उत्तराध्ययन सूत्र 1.15 कहता है— अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो। अप्पा दंतो सुही होइ, अस्सिं लोए परत्थ य॥
अर्थ—अपने ही ऊपर संयम करना चाहिए; स्वयं को जीतना अत्यंत कठिन है। जिसने अपने को संयमित कर लिया, वही इस लोक और परलोक में सुखी होता है।
इसके अगले सूत्र का भाव और अधिक प्रभावशाली है—वरं मे अप्पा दंतो, संजमेण तवेण य…
अर्थात् दूसरों द्वारा दंडित होने की अपेक्षा संयम और तप से स्वयं को अनुशासित करना श्रेष्ठ है।
यह पर्युषण का केंद्रीय प्रश्न बन सकता है—मैं आठ दिनों में किसे नियंत्रित कर रहा हूँ—केवल अपनी थाली को या अपने क्रोध को भी?
- थाली को नियंत्रित करना अपेक्षाकृत सरल है, अपमान के समय प्रतिक्रिया रोकना कठिन है।
- भोजन छोड़ना सरल हो सकता है, अहंकार छोड़ना कठिन है।
- मिठाई छोड़ना सरल है, किसी के प्रति वर्षों पुराना वैर छोड़ना कठिन है।
इसलिए यदि पर्युषण तप है, तो उसका सबसे बड़ा प्रयोग शरीर पर नहीं—कषायों पर होना चाहिए।
दशवैकालिक : धर्म का सार क्या है?
दशवैकालिक सूत्र का प्रसिद्ध उद्घोष है— धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
अर्थ— धर्म सर्वोत्तम मंगल है; उसका स्वरूप अहिंसा, संयम और तप है। —दशवैकालिक, प्रथम अध्ययन 1.1
ध्यान दीजिए— यहाँ धर्म का परिचय किसी भोजन-सूची से नहीं दिया गया। तीन शब्द हैं— अहिंसा। संयम। तप। अब भोजन का त्याग इन तीनों का साधन बन सकता है।
- जमीकंद का त्याग अहिंसा की संवेदनशीलता का अभ्यास हो सकता है।
- रस-त्याग संयम का अभ्यास हो सकता है।
- उपवास तप का साधन हो सकता है।
लेकिन साधन और साध्य में अंतर भूल जाना ही धर्म की सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।
यदि उपवास से अहंकार बढ़ गया, तो तप ने कषाय घटाया या बढ़ाया?
यदि व्यक्ति आठ उपवास करके दूसरों को छोटा समझने लगे, तो शरीर भूखा रहा—अहंकार तो और पुष्ट हो गया।
जैन दर्शन का लक्ष्य भूख का प्रदर्शन नहीं, कर्म और कषाय की निर्जरा है।
पर्युषण की सबसे बड़ी प्रयोगशाला : प्रतिक्रमण
पर्युषण को केवल उपवास से जोड़ देना इसलिए भी अधूरा है क्योंकि जैन साधना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधार है— प्रतिक्रमण।
“प्रति + क्रमण”—अर्थात् जहाँ से मैं भटक गया, वहाँ से वापस लौटना।
- दिन भर में मैंने क्या किया?
- किससे कठोर बोला?
- किस जीव को पीड़ा दी?
- कहाँ लोभ हुआ?
- कहाँ अहंकार आया?
- कहाँ मैंने सत्य को अपने लाभ के अनुसार मोड़ा?
- कहाँ किसी के प्रति द्वेष पैदा हुआ?
इन सबकी समीक्षा करना प्रतिक्रमण की आत्मा है।
आवश्यक और श्रावक-प्रतिक्रमण परंपरा में प्रसिद्ध क्षमापना आती है—
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ति मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ॥
अर्थ— मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ और सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी प्राणियों के प्रति मेरी मैत्री हो; मेरा किसी से वैर न रहे। श्रावक प्रतिक्रमण-पाठ में इसके ठीक पहले साधक भावपूर्वक समस्त जीव-राशि से क्षमा मांगने और सभी को क्षमा करने की भावना व्यक्त करता है।
यही पर्युषण का शायद सबसे कठोर प्रयोग है।
- क्योंकि उपवास में हमें अपने शरीर से लड़ना पड़ता है।
- लेकिन क्षमा में हमें अपने अहंकार से लड़ना पड़ता है।
और महावीर के दर्शन में अहंकार से कठिन प्रतिद्वंद्वी शायद ही कोई दूसरा हो।
“मिच्छामि दुक्कडम्” केवल संदेश नहीं है
आज संवत्सरी के दिन हजारों संदेश भेजे जाते हैं— “मिच्छामि दुक्कडम्”
यह सुंदर परंपरा है, लेकिन यदि वही संदेश उस व्यक्ति को भी भेज दिया जिससे वर्षभर कोई संबंध नहीं रखा, और अगले दिन संबंध फिर वैसा ही हो गया—तो क्षमा केवल मोबाइल के स्क्रीन तक सीमित रह गई।
आगमिक क्षमा का अर्थ केवल यह कहना नहीं—“मेरी गलती हुई हो तो क्षमा करना।” उसका अर्थ है—मैं अपने भीतर उस वैर को खोजूँ जो हमारे बीच खड़ा है।
क्षमापना तभी जीवित होगी जब “वेरं मज्झं ण केणइ”—मेरा किसी से वैर न रहे—जीवन में उतरने लगे।
पर्युषण और भोजन : तो क्या भोजन-नियम महत्वहीन हैं?
बिल्कुल नहीं। यह निष्कर्ष निकालना भी उतना ही गलत होगा कि यदि पर्युषण आत्मशुद्धि है तो भोजन के नियम आवश्यक नहीं। जैन दर्शन शरीर और मन को अलग-अलग प्रयोगशाला नहीं मानता।
- भोजन इन्द्रियों से जुड़ा है।
- इन्द्रियाँ इच्छा से जुड़ी हैं।
- इच्छा आसक्ति से जुड़ी है।
- आसक्ति राग से जुड़ी है।
इसलिए आहार-संयम मन के प्रशिक्षण का माध्यम बनता है।
समस्या भोजन त्यागने में नहीं है, समस्या तब है जब हम भोजन-त्याग को ही धर्म की पूर्णता समझ लेते हैं। यदि आठ दिनों तक आलू-प्याज नहीं खाया, तो यह अहिंसा का अभ्यास है, लेकिन उसके साथ यह प्रश्न भी होना चाहिए—
- क्या इन आठ दिनों में मैंने क्रोध कम किया?
- क्या मेरी भाषा अधिक कोमल हुई?
- क्या कर्मचारी, नौकर, परिवार, पड़ोसी और विरोधी के प्रति व्यवहार बदला?
- क्या किसी ऐसे व्यक्ति को फोन किया जिससे अहंकार के कारण संबंध टूट गया था?
- क्या किसी की आलोचना करने से पहले अनेकांत से उसका पक्ष समझने का प्रयास किया?
- क्या मेरी आवश्यकताएँ थोड़ी कम हुईं?
- क्या मेरे भीतर किसी प्राणी की पीड़ा को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी?
यदि उत्तर “हाँ” की दिशा में बढ़ रहा है— तब भोजन की मर्यादा आत्म-परिवर्तन का साधन बन गई।
एक बहुत सुंदर आगमिक यात्रा
पर्युषण का पूरा विकास मानो तीन चरणों में समझा जा सकता है—
पहला चरण—स्थान का परिवर्तन।
वर्षा में विहार छोड़कर एक स्थान पर स्थिर होना।
दूसरा चरण—जीवन-शैली का परिवर्तन।
आहार, विहार, तप, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और अहिंसा में अधिक सावधानी।
तीसरा चरण—चेतना का परिवर्तन।
क्रोध, मान, माया, लोभ और राग-द्वेष का उपशमन।
यहीं “वर्षावास” धीरे-धीरे आत्मावास बनता है। और शायद इसीलिए “आत्मा के समीप निवास” पर्युषण की ऐतिहासिक व्युत्पत्ति न होते हुए भी उसकी आध्यात्मिक परिणति का अत्यंत सटीक वर्णन है।
यदि पर्युषण के बाद हम वही रह गए तो?
मान लीजिए—आठ दिन तक भोजन अत्यंत शुद्ध रहा, लेकिन विचार अशुद्ध रहे।
रात्रिभोजन नहीं किया, लेकिन रातभर किसी से द्वेष करते रहे।
जमीकंद नहीं खाया, लेकिन किसी मनुष्य की जड़ काटने में लगे रहे।
हरा पदार्थ नहीं लिया, लेकिन ईर्ष्या हरी-भरी रही।
आठ उपवास किए, लेकिन अहंकार का पोषण करते रहे।
तो हमें स्वयं से पूछना होगा— पर्युषण शरीर ने किया या आत्मा ने?
महावीर का धर्म बाहरी अनुशासन को नकारता नहीं; वह उसे भीतर तक ले जाता है। इसलिए पर्युषण की सफलता इस बात से नहीं मापी जा सकती कि हमने कितने दिन उपवास किया। उसकी सबसे वास्तविक कसौटी शायद यह है— पर्युषण से पहले मैं जैसा मनुष्य था, क्या संवत्सरी के बाद उसमें कुछ परिवर्तन आया?
समाज के लिए पर्युषण का आधुनिक संदेश
आज मनुष्य पहले की तुलना में अधिक सुविधासंपन्न है, लेकिन शायद उतना ही प्रतिक्रियाशील भी। सोशल मीडिया पर एक वाक्य हिंसा बन जाता है, राजनीतिक मतभेद वैर बन जाता है, पारिवारिक विवाद वर्षों की दूरी बन जाता है, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा शत्रुता बन जाती है, धार्मिक मतभेद अहंकार बन जाता है। ऐसे समय में पर्युषण की आवश्यकता केवल जैन समाज को नहीं, पूरी मानवता को है।
पर्युषण हमें सिखाता है—
अपनी गति कम करो।
अपनी आवश्यकता कम करो।
अपनी प्रतिक्रिया कम करो।
अपना अहंकार कम करो।
और—
दूसरे जीवन के प्रति अपनी संवेदनशीलता बढ़ाओ।
थाली से आत्मा तक
पर्युषण के आठ दिन हमारी थाली बदलें—यह अच्छा है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि वे हमारी दृष्टि बदलें।
- भोजन से हिंसा कम हो।
- वाणी से हिंसा कम हो।
- व्यवहार से हिंसा कम हो।
- विचार से हिंसा कम हो।
- अहंकार से हिंसा कम हो।
और अंततः—अपने भीतर चल रही हिंसा भी कम हो, क्योंकि जो व्यक्ति भीतर लगातार क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और असंतोष में जल रहा है, वह स्वयं के प्रति भी अहिंसक नहीं है।
पर्युषण का अंतिम प्रश्न
संवत्सरी की संध्या को हमें स्वयं से शायद यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए— “मैंने कितने उपवास किए?”
पहला प्रश्न होना चाहिए—
- “मैंने कितना वैर छोड़ा?”
- कितना क्रोध कम हुआ?
- कितना अहंकार झुका?
- कितनी इच्छाएँ सीमित हुईं?
- कितनी संवेदनशीलता बढ़ी?
- कितने संबंध सुधरे?
- कितने जीवों के प्रति करुणा जागी?
- और मैं अपने वास्तविक स्वरूप के कितना निकट आया?
तभी कल्पसूत्र का बाहरी वासावास
उत्तराध्ययन का आत्मसंयम,
आचारांग की अहिंसा,
दशवैकालिक का तप,
और आवश्यक का प्रतिक्रमण एवं क्षमा
एक ही स्थान पर आकर मिलते हैं, और शायद इसी बिंदु पर पर्युषण अपने सबसे गहरे अर्थ में प्रकट होता है—
संसार को छोड़कर कहीं चले जाना नहीं,
संसार के बीच रहते हुए स्वयं में लौट आना।
भोजन की सूची बदलना नहीं,
जीवन की दृष्टि बदलना।
आठ दिन धार्मिक दिखाई देना नहीं,
आठ दिनों के माध्यम से शेष वर्ष के लिए थोड़ा अधिक अहिंसक, थोड़ा अधिक विनम्र, थोड़ा अधिक संयमी और थोड़ा अधिक जागरूक मनुष्य बन जाना।
यही पर्युषण है— पर्व नहीं, आत्मा में पुनः निवास।
— विकास जैन ✍️
