महावीर दर्शनपरम्परा से प्रज्ञा की ओर

विवेकपूर्ण चर्चाविकास जैन

“वंदना और कामना”

‘त्याग और संघर्ष के आराध्यों से सुख और ऐश्वर्य की अपेक्षा—हमारी आस्था का अंतर्विरोध।’

राम का संघर्ष, कृष्ण की वियोग-वेदना और महावीर की समता

“वंदना और कामना”

‘त्याग और संघर्ष के आराध्यों से सुख और ऐश्वर्य की अपेक्षा—हमारी आस्था का अंतर्विरोध।’

आज हम जिन महापुरुषों को भगवान या तीर्थंकर के रूप में पूजते हैं, उनके जीवन को देखें तो हमारी श्रद्धा और आकांक्षाओं के बीच एक गहरा अंतर्विरोध दिखाई देता है। राम, कृष्ण और महावीर—इनके जीवन में त्याग, संघर्ष और कठिन परीक्षाएँ आईं। फिर भी इनके सामने खड़े होकर हम प्रायः यही माँगते हैं कि हमारे जीवन में कोई कठिनाई, त्याग या परीक्षा न आए!

राम ने राजमहल छोड़कर वनवास स्वीकार किया, प्रियजनों से वियोग सहा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया। कृष्ण की जीवनयात्रा कारागार में जन्म से लेकर युद्ध, षड्यंत्रों और अपनों के वियोग तक पहुँची। महावीर ने राजसी सुविधाएँ त्यागकर लगभग साढ़े बारह वर्षों तक तप, ध्यान और आत्म-साधना का मार्ग अपनाया।

रावण की सोने की लंका और कंस की राजसत्ता उन्हें वंदनीय नहीं बना सकीं। हमारे आराध्यों के प्रति श्रद्धा का आधार उनका वैभव नहीं, उनके आदर्श और आत्मविजय हैं।

फिर विडंबना देखिए—शीश हम त्याग के सामने झुकाते हैं, लेकिन माँगते समय संग्रह, सुविधा और वैभव हमारी सूची में सबसे ऊपर होते हैं!

कृष्ण का जीवन इस प्रश्न को और गहरा करता है। महाभारत के मौसल पर्व में वे अपने यादव कुल के व्यापक विनाश के साक्षी बनते हैं—ऐसा विनाश जो आपसी संघर्ष से हुआ। अंततः जरा नामक शिकारी का बाण उनके देहावसान का निमित्त बना और उनके प्रस्थान के बाद वैभवशाली द्वारका भी समुद्र में समा गई।

इन घटनाओं को हम ईश्वर की लीला मान सकते हैं, किंतु तब उस लीला में छिपे संदेश को भी स्वीकार करना होगा। सत्ता, संपत्ति, संबंध और शरीर—कुछ भी सदा एक समान नहीं रहता। जिनकी जीवनकथा स्वयं अनित्यता का बोध कराती है, उनसे हम अपने प्रत्येक सुख को स्थायी बनाए रखने का आश्वासन क्यों चाहते हैं?

महावीर का जीवन इसमें आत्म-पुरुषार्थ का महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है। जैन परंपरा में वर्णित प्रसंग के अनुसार, देवराज इंद्र ने उपसर्गों से उनकी रक्षा का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इसका मर्म स्पष्ट है—आत्मबोध और मुक्ति की साधना स्वयं करनी होती है; हमारे भीतर का परिवर्तन कोई दूसरा हमारे स्थान पर नहीं कर सकता।

महावीर की साधना केवल कष्ट सहना नहीं थी। उसका केंद्र समता, संयम, ध्यान और राग-द्वेष का क्षय था। पीड़ा के बीच क्रोध और प्रतिशोध पालना अथवा क्षमा और विवेक बनाए रखना—यही अंतर साधना की दिशा तय करता है।

उनकी महानता केवल इसमें नहीं थी कि उन्होंने कितने कष्ट सहे; इसमें भी थी कि उन कष्टों के बीच अपने भीतर क्या नहीं पनपने दिया।

लेकिन हम चाहते हैं कि आराध्य हमारी परिस्थितियाँ बदल दें, जबकि हमें अपना स्वभाव न बदलना पड़े। चरणों में फूल चढ़ाना सहज लगता है; व्यवहार से छल, क्रोध और अहंकार कम करना कठिन।

सुख, स्वास्थ्य और परिवार की सुरक्षा की कामना स्वाभाविक है। प्रश्न तब उठता है जब इच्छापूर्ति ही धर्म का उद्देश्य बन जाए और उसके लिए आवश्यक श्रम, संयम तथा जिम्मेदारी से हम बचने लगें। इसी कमजोरी का लाभ वे लोग उठाते हैं जो धर्म के नाम पर हर समस्या का चमत्कारी समाधान बेचते हैं। भयभीत मनुष्य की विवशता करुणा की अधिकारी है; उसे चमत्कारों का ग्राहक बना देना धर्म नहीं हो सकता।

प्रार्थना मन को स्थिर करे, श्रद्धा साहस दे और आराधना आचरण सँवारे—तभी वे जीवन में सार्थक होंगी। संघर्ष अपने आप किसी को महान नहीं बनाता; कठिनाइयाँ तोड़ भी सकती हैं। इसलिए उद्देश्य कष्ट खोजना नहीं, उनका विवेकपूर्ण समाधान करना और उनके बीच अपनी संवेदना बचाए रखना है।

विपरीत परिस्थितियों में ठहरें, तथ्य समझें, आवश्यक सलाह और सहयोग लें तथा अपने हिस्से का प्रयास करें। सहायता स्वीकार करना आत्म-पुरुषार्थ के विरुद्ध नहीं है; अपनी जिम्मेदारी से बचना उसे कमजोर करता है।

राम की मर्यादा व्यवहार में, कृष्ण का कर्तव्यबोध निर्णयों में और महावीर की समता मन में उतरने लगे—यही हमारी आराधना की सार्थक परिणति होगी।

हमारी प्रार्थना केवल संकटमुक्त जीवन की क्यों हो? उसमें यह संकल्प भी हो—कठिनाइयों को दूर करने का विवेक और पुरुषार्थ मुझमें जागे; और जब तक वे रहें, मेरी करुणा, समता और धैर्य उनसे छोटे न पड़ें।

जिस दिन पूजा के बाद हमारे व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देने लगेगा, उस दिन हमारे आराध्य मंदिर के साथ हमारे जीवन में भी प्रतिष्ठित होने लगेंगे।

श्रद्धा प्रेरणा देती है, पर परिवर्तन आत्म-प्रयोग से जन्म लेता है।