सच्चा गुरु-अनुयायी से आत्मनिर्भर साधक तक की यात्रा
सच्चे गुरु के प्रति हमारी श्रद्धा की सार्थक परिणति यही है कि हम केवल अनुयायी बने रहने से आगे बढ़ें और जागरूक, उत्तरदायी तथा आत्मनिर्भर श्रावक बनें।
सच्चे गुरु की सार्थकता शिष्य को अपने ऊपर निर्भर बनाए रखने में नहीं, उसके भीतर स्वतंत्र बोध और आत्मानुभव की क्षमता विकसित करने में है।
गुरु दिशा दिखाते हैं, साधना का विवेक जगाते हैं और हमारी भूलों को पहचानने में सहायक होते हैं। किंतु उस दिशा में चलना, अपने कषायों को देखना और जीवन में परिवर्तन लाना स्वयं साधक का पुरुषार्थ है। गुरु के प्रति श्रद्धा इस यात्रा की प्रेरणा है; आत्म-प्रयोग उसकी गति।
केवलज्ञानी की वीतराग चेतना के सान्निध्य में आने वाले सभी व्यक्तियों की ग्रहणशीलता समान नहीं होती। कोई उनके ज्ञान से प्रभावित होता है, कोई उनकी प्रतिष्ठा से; कोई अपनी मान्यताओं का समर्थन चाहता है, तो कोई स्वयं को बदलने का मार्ग खोजता है। लाभ उतना ही होता है, जितना व्यक्ति अपने आग्रहों को छोड़कर सत्य को समझने के लिए तैयार होता है।
वीतराग की समता हमारे अहंकार को पोषण नहीं देती। हम चाहते हैं कि वे हमारे पक्ष को श्रेष्ठ बताएँ, जबकि उनकी देशना हमें अपने राग-द्वेष को देखने की दिशा देती है। यहीं साधक की परीक्षा शुरू होती है—वह स्वयं को बदलना चाहता है या धर्म के माध्यम से स्वयं को सही सिद्ध करना?
*महावीर के साथ चलना और महावीर की दिशा में चलना—दो अलग बातें हैं।*
गोशालक प्रसंग इसी अंतर पर आत्ममंथन का अवसर देता है। जब साधना में आत्मशुद्धि की अपेक्षा विशिष्ट होने का आग्रह बढ़ने लगे, तब साधना भी अहंकार का विस्तार बन सकती है। इस प्रवृत्ति को दूसरों में खोजने से पहले अपने भीतर पहचानना आवश्यक है।
साधना के प्रभाव से लोग जुड़ते हैं और संगठन बनते हैं। संगठन अध्ययन, सेवा और अनुशासन का उपयोगी माध्यम है। किंतु जब साधकों के परिवर्तन से अधिक अनुयायियों की संख्या, पद और प्रभाव महत्त्वपूर्ण होने लगें, तब उद्देश्य पीछे छूटने लगता है। प्रश्न असुविधाजनक लगने लगते हैं और विवेक के स्थान पर व्यक्ति के प्रति निष्ठा को कसौटी बनाया जाने लगता है।
तब विचार करना चाहिए—जिस व्यवस्था को मनुष्य के भीतर की पकड़ ढीली करनी थी, कहीं वही उसे नए आग्रहों में तो नहीं बाँध रही?
हमारी पुस्तक “महावीर : जीवन का विज्ञान” का भाव भी यही है—*”तीर्थंकर की शक्ति आश्रित अनुयायी बनाना नहीं; आत्मनिर्भर साधक को जन्म देना है।”*
वर्तमान समाज में संत और श्रावक के संबंध की सार्थकता भी इसी कसौटी पर समझी जा सकती है। संत का मार्गदर्शन श्रावक में इतना विवेक जगाए कि वह दैनिक जीवन में अहिंसा, संयम, सत्य और अपरिग्रह के अनुसार स्वयं निर्णय लेना सीखे। प्रवचन की सफलता तब प्रकट हो, जब व्यापार में ईमानदारी, परिवार में सहिष्णुता और मतभेद में समता बढ़े।
श्रावक की जिम्मेदारी भी केवल दर्शन, वंदन और आयोजन तक सीमित नहीं है। उसे स्वयं से पूछना होगा—क्या मेरी श्रद्धा मेरे आचरण में उतर रही है? क्या मेरा क्रोध घट रहा है? क्या मैं अपनी भूल स्वीकार कर पाता हूँ? क्या धर्म मेरे जीवन के निर्णयों में उपस्थित है?
आत्मनिर्भर श्रावक होने का अर्थ गुरु के प्रति सम्मान घटाना नहीं है। उसका अर्थ है—उनके मार्गदर्शन को अपने विवेक और आचरण में इतना विकसित करना कि प्रत्येक निर्णय के लिए बाहरी सहारे की प्रतीक्षा न करनी पड़े।
सच्चे गुरु के प्रति हमारी श्रद्धा की सार्थक परिणति यही है कि हम केवल अनुयायी बने रहने से आगे बढ़ें और जागरूक, उत्तरदायी तथा आत्मनिर्भर श्रावक बनें।
