महावीर दर्शनपरम्परा से प्रज्ञा की ओर

पाखंड से मुक्तिविकास जैन

क्या कर्म-सिद्धांत केवल अंतिम पंक्ति के लिए है?

यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति, संस्था, संघ अथवा आयोजन के विरुद्ध नहीं है। यह हम सबके लिए आत्मनिरीक्षण का प्रश्न है, क्योंकि धर्म की साख केवल विरोधियों के कारण नहीं गिरती; कई बार वह उसके अनुयायियों के आचरण और धर्म के नाम पर खड़ी की गई हमारी प्राथमिकताओं के कारण भी क्षीण होती है।

पर्युषण की व्युत्पत्ति को भिन्न-भिन्न रूपों में समझाया जाता है, किंतु उसकी साधना का केंद्र निर्विवाद है—आत्मावलोकन, उपशम, संयम, स्वाध्याय, क्षमापना और अपने कषायों की पहचान। यह पर्व संसार को यह दिखाने का नहीं कि हम कितने धार्मिक हैं; स्वयं यह देखने का अवसर है कि हमारे भीतर धर्म कितना जागा है।

भव्यता अपने आप में पाप नहीं है। साधन-संपन्नता भी दोष नहीं है। बड़े आयोजन, आधुनिक सुविधाएँ, विशाल सभागार और सार्वजनिक व्यक्तियों की उपस्थिति कभी-कभी जिनवाणी को अधिक लोगों तक पहुँचाने में उपयोगी हो सकती है। संकट वहाँ आरंभ होता है जहाँ साधन ही साध्य बन जाते हैं; जहाँ जिनवाणी मंच की सजावट का एक अंश रह जाती है और मंच, व्यक्तियों तथा व्यवस्थापकों की प्रतिष्ठा मुख्य विषय बन जाती है।

जब धर्मसभा के बाद चर्चा यह न हो कि प्रवचन से जीवन में क्या उतारना है, बल्कि यह हो कि मंच पर कौन बैठा, किसे विशेष आसन मिला, किसका स्वागत हुआ और किसकी तस्वीर किस प्रभावशाली व्यक्ति के साथ प्रकाशित हुई—तब हमें गंभीरता से पूछना चाहिए कि वहाँ धर्म की प्रभावना हुई या प्रभावशाली लोगों की?

प्रभावना वह नहीं जिसमें धर्म के माध्यम से कोई व्यक्ति बड़ा दिखाई दे। सच्ची प्रभावना वह है जिसमें व्यक्ति का ‘मैं’ छोटा हो और धर्म का मर्म बड़ा होकर प्रकट हो।

क्या कर्म-सिद्धांत केवल अंतिम पंक्ति के लिए है?

सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब एक सामान्य श्रावक अपनी मर्यादा के अनुसार उपवास करता है, सामायिक और प्रतिक्रमण करता है, अपनी छोटी-छोटी भूलों के लिए भी पश्चात्ताप करता है; किंतु धार्मिक आयोजनों के अग्रिम स्थानों पर प्रतिष्ठा, संपत्ति और राजनीतिक संपर्क ही पात्रता के प्रमुख आधार दिखाई देते हैं।

क्या धर्मसभा की पहली पंक्ति किसी साधन-संपन्न वर्ग की स्थायी संपत्ति है? क्या वर्षों से मौन साधना करने वाला श्रावक केवल भीड़ का हिस्सा है और प्रभावशाली व्यक्ति धर्मसभा का केंद्र?

धर्मसभा में विशिष्ट अतिथि हो सकते हैं, लेकिन धर्म की दृष्टि में कोई ‘वीआईपी’ नहीं होता। वहाँ तपस्वी का त्याग, जिज्ञासु की विनम्रता और साधक की पात्रता महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए—उसका पद, धन अथवा परिचय नहीं।

जैन कर्मवाद में किसी बाहरी निर्णायक अथवा ‘चित्रगुप्त’ का बहीखाता नहीं है। आत्मा का प्रत्येक परिणाम स्वयं उसका साक्षी भी है और कर्मबंधन का कारण भी। मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और मन-वचन-काया की अशुभ प्रवृत्ति ही बंध के कारण बताए गए हैं। इसलिए कोई धार्मिक नाम, विशाल व्यय अथवा प्रभावशाली उपस्थिति हमारे प्रमाद और मान-कषाय को स्वतः पुण्य में परिवर्तित नहीं कर सकती।

धर्म की रक्षा के नाम पर धर्म की मर्यादा का विस्मरण

धर्म और समाज की मर्यादा को सुरक्षित रखने का दायित्व जिन साधन-संपन्न श्रावकों और आयोजकों पर अधिक है, यदि वही वर्ग धर्म को प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन में बदलने लगे, तो चिंता स्वाभाविक है।

चातुर्मास प्रवेश के अवसर पर हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा, अत्यधिक प्रकाश और ध्वनि, ताजे फूलों की विशाल सजावट, अस्थायी निर्माण तथा अनावश्यक तामझाम—इन सबको केवल इसलिए प्रश्नों से परे नहीं माना जा सकता कि इनके साथ ‘धर्मप्रभावना’ शब्द जोड़ दिया गया है।

जैन दर्शन पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति में भी जीवत्व स्वीकार करके हमारे विवेक को अत्यंत सूक्ष्म बनाता है। इसका उद्देश्य गृहस्थ को भय अथवा असंभव अपराधबोध देना नहीं, बल्कि प्रत्येक कार्य में आवश्यकता, मर्यादा और जयणा का विचार जगाना है।

अतः प्रत्येक बड़े धार्मिक आयोजन से पहले कुछ सरल प्रश्न पूछे जाने चाहिए—

क्या यह संसाधन वास्तव में आवश्यक है?
क्या यही कार्य कम हिंसा और कम अपव्यय से हो सकता है?
क्या इस व्यय से जिनवाणी का प्रभाव बढ़ेगा या आयोजकों की प्रतिष्ठा?
क्या पुष्पवर्षा से अधिक सार्थक किसी जरूरतमंद की सहायता नहीं होगी?
क्या यह आयोजन साधकों को धर्म के निकट ले जाएगा या केवल दर्शकों की भीड़ बढ़ाएगा?

हर सुविधा का निषेध समाधान नहीं है, पर प्रत्येक सुविधा को धर्म का अनिवार्य अंग मान लेना भी उचित नहीं है। विवेक का अर्थ यही है कि उपयोग और उपभोग, आवश्यकता और प्रदर्शन तथा प्रभावना और प्रतिष्ठा के अंतर को पहचाना जाए।

स्थान नहीं, वातावरण और उद्देश्य विचारणीय हैं

परंपरागत उपाश्रय अथवा स्थानक उपलब्ध न होने पर किसी बड़े सभागार या अन्य उपयुक्त परिसर का उपयोग करना परिस्थितिजन्य आवश्यकता हो सकती है। केवल स्थान बदल जाने से धर्म अपवित्र नहीं हो जाता।

लेकिन जब विलासिता, सजावट, आराम और उत्सवी तामझाम इतने प्रधान हो जाएँ कि संयम, सादगी और अंतर्मुखता पीछे छूट जाए, तब विरोधाभास अवश्य उत्पन्न होता है।

चातुर्मास का मूल भाव एक स्थान पर स्थिर होकर आत्मा में ठहरने का है, किंतु उसकी सादगी स्वयं निरंतर स्थान बदलती जा रही है। स्थानकों और उपाश्रयों से निकलकर चातुर्मास वैवाहिक वाटिकाओं तक पहुँच चुका है; और यदि यही यात्रा जारी रही, तो वह दिन भी दूर नहीं जब संयम और अपरिग्रह की देशना पाँच सितारा होटलों के वातानुकूलित सभागारों से सुनाई देने लगेगी।

यह केवल काल्पनिक आशंका भी नहीं है। वर्ष 2023 में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी के ऐतिहासिक मुंबई चातुर्मास के लिए घोड़बंदर रोड, ठाणे में चातुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति द्वारा एक विस्तृत अस्थायी धर्मनगरी विकसित की गई, जिसे ‘नंदनवन’ नाम दिया गया। आचार्य तुलसी के वर्ष 1954 के मुंबई चातुर्मास के लगभग 69 वर्षों बाद आयोजित इस चातुर्मास में देश-विदेश से आने वाले विशाल श्रद्धालु समुदाय के लिए आवास, बड़ा प्रवचन पंडाल, भोजनशाला तथा अनेक आधुनिक व्यवस्थाएँ उपलब्ध कराई गईं। पूरा परिसर हजारों लोगों को समायोजित करने वाली एक अस्थायी ‘मिनी-सिटी’ के रूप में विकसित किया गया था।

निश्चित ही इतने बड़े जनसमुदाय के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ करना आयोजकों का दायित्व था और सुविधा का प्रत्येक रूप विलासिता नहीं माना जा सकता। आचार्यश्री की साधना, विहार और संयम पर भी इससे कोई प्रश्न नहीं उठता। प्रश्न संत के संयम का नहीं, उनके नाम पर श्रावक समाज द्वारा निरंतर बढ़ाई जा रही आयोजन-संस्कृति का है।

विचारणीय यह है कि क्या धर्म की प्रभावना के लिए अब धर्मनगरी बसाना भी अनिवार्य हो गया है? क्या जिनवाणी की शक्ति उसके सत्य और साधना में कम पड़ गई है, जिसे प्रभावी बनाने के लिए बाजार, प्रदर्शन और उत्सवी आकर्षणों की आवश्यकता पड़ने लगी? और यदि प्रत्येक अगला नगर पिछले आयोजन से अधिक भव्य दिखने की प्रतिस्पर्धा करेगा, तो यह यात्रा अंततः कहाँ जाकर रुकेगी?

मुंबई में परिस्थितिजन्य आवश्यकता के रूप में आरंभ हुई ऐसी व्यवस्था यदि दूसरे नगरों के लिए प्रतिष्ठा का मानक बन जाए, तो चिंता स्वाभाविक है। आज इंदौर भी उसी दिशा में कदम बढ़ाता दिखाई दे रहा है। यहाँ प्रश्न यह नहीं कि नंदनवन क्यों बनाया गया; प्रश्न यह है कि कहीं उसकी व्यवस्थागत भव्यता को ही धर्मप्रभावना का आदर्श मानकर प्रत्येक नगर उससे आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा तो आरंभ नहीं कर देगा?

सुविधा का उपयोग धर्म के लिए हो, इसमें कोई आपत्ति नहीं; किंतु धर्म का उपयोग सुविधाओं, प्रतिष्ठा और आयोजन-सामर्थ्य के प्रदर्शन के लिए होने लगे, तो आत्मनिरीक्षण आवश्यक है। कहीं ऐसा न हो कि प्रवचन सुनने की व्यवस्था निरंतर भव्य होती जाए, पर उसे जीवन में उतारने की तैयारी क्षीण होती जाए; धर्मसभा का परिसर विशाल होता जाए, पर आत्मचिंतन के लिए हमारे भीतर उपलब्ध स्थान छोटा पड़ता जाए।

अस्थायी धर्मनगरी बस जाना आयोजन-कौशल की उपलब्धि हो सकती है; धर्मप्रभावना की वास्तविक उपलब्धि तब होगी, जब वहाँ से लौटने वाले मनुष्यों के भीतर संयम, करुणा, समानता और अपरिग्रह का कोई स्थायी नगर बस सके।

मोक्षमार्ग की देशना कहीं भी सुनी जा सकती है, पर उसे सुनने के लिए निर्मित वातावरण हमारे भीतर वैराग्य जगा रहा है या उपभोग की आकांक्षा—इसका ईमानदार परीक्षण आवश्यक है।

कषायों का विसर्जन अथवा उनका सार्वजनिक उत्सव?

पर्युषण में हम बार-बार कहते हैं—“मिच्छामि दुक्कडं।”

लेकिन क्या यह केवल उच्चारण है, अथवा अपने मान, माया, क्रोध और लोभ को पहचानने की तैयारी भी?

यदि मंच पर स्थान न मिलने से मन व्यथित हो जाए, नाम घोषित न होने से क्रोध आ जाए, स्वागत में कमी रह जाने से संबंध बिगड़ जाएँ, तस्वीर प्रकाशित न होने से आयोजन फीका लगने लगे और किसी प्रभावशाली व्यक्ति की निकटता सामाजिक उपलब्धि बन जाए—तो हम किससे क्षमा माँग रहे हैं? दूसरों से, या उस आत्मा से जिसकी आवाज को हमने अपने अहंकार के शोर में दबा दिया है?

मंच कितना ऊँचा था, इसका आध्यात्मिक महत्त्व नहीं है; उस मंच पर बैठकर मन कितना विनम्र हुआ—महत्त्व इसका है।

कितने फूल चढ़े, यह निर्णायक नहीं है; भीतर के कितने कषाय झड़े—प्रश्न यह है।

कितने लोगों ने हमारी तस्वीर देखी, इससे धर्म नहीं मापा जा सकता; हमारे व्यवहार में कितनी करुणा, समता और सरलता आई—वास्तविक कसौटी यह है।

आलोचना करते समय हमारा भी आत्मनिरीक्षण हो

यह लिखते समय स्वयं को भी सावधान करना आवश्यक है। कहीं अहंकार का विरोध करते हुए हमारी भाषा स्वयं क्रोध, कटुता और परपरिवाद का माध्यम न बन जाए। धर्म के नाम पर प्रदर्शन अनुचित है, किंतु प्रदर्शन करने वालों के प्रति द्वेष पालना भी धर्म नहीं है।

हमारा प्रश्न व्यक्ति से नहीं, प्रवृत्ति से है। हमारा उद्देश्य किसी को अपमानित करना नहीं, बल्कि हम सबके भीतर सोई हुई धार्मिक संवेदना को जगाना है। अनेकांत हमें सिखाता है कि सामने वाले की परिस्थिति, भावना और उद्देश्य के सभी पक्ष हमें ज्ञात नहीं होते। अतः जहाँ प्रश्न आवश्यक हों वहाँ प्रश्न अवश्य उठें, लेकिन भाषा में करुणा और अपने भीतर विनम्रता बनी रहे।

क्योंकि संभव है कि जिस मान-कषाय को हम किसी दूसरे के मंच पर देख रहे हैं, वही मान-कषाय हमारी आलोचना के शब्दों में भी छिपा बैठा हो।

धर्मप्रभावना की नई कसौटी

अब समय आ गया है कि धार्मिक आयोजनों की सफलता को नई—और वास्तव में प्राचीन—कसौटियों पर मापा जाए:

  • कितने विशिष्ट अतिथि आए, इसके स्थान पर कितने सामान्य लोग धर्म से जुड़े?
  • कितनी तस्वीरें प्रकाशित हुईं, इसके स्थान पर कितने लोगों ने सामायिक, स्वाध्याय अथवा प्रतिक्रमण आरंभ किया?
  • मंच पर कितने सम्मान हुए, इसके स्थान पर समाज में कितनी समानता अनुभव हुई?
  • सजावट पर कितना व्यय हुआ, इसके स्थान पर कितने संसाधनों का अपव्यय बचाया गया?
  • कितने लोगों ने आयोजन देखा, इसके स्थान पर कितने लोगों के विचार और व्यवहार में स्थायी परिवर्तन आया?

और सबसे बढ़कर—क्या आयोजन के बाद आयोजकों का अहंकार घटा, श्रावकों की संवेदनशीलता बढ़ी और जिनवाणी के प्रति श्रद्धा अधिक निर्मल हुई?

समय रहते समाज के सामने एक आवश्यक दर्पण रखा जा सकता है। लेकिन इस दर्पण का उद्देश्य किसी का चेहरा कुरूप सिद्ध करना नहीं, बल्कि अपने चेहरे पर जमी हुई परतों को पहचानना है।

धर्म की साख भाषणों से नहीं लौटेगी। वह तब लौटेगी जब हमारे आयोजन सादगी, समानता और संवेदनशीलता का उदाहरण बनेंगे; जब धन धर्म पर अपना अधिकार प्रदर्शित नहीं करेगा, बल्कि विनम्रतापूर्वक उसका साधन बनेगा; जब सत्ता का उपयोग मंच की ऊँचाई बढ़ाने में नहीं, पीड़ितों की सहायता और समाजहित में होगा; और जब पर्यूषण के बाद केवल हमारे सोशल मीडिया की तस्वीरें नहीं, बल्कि हमारे स्वभाव, संबंध और जीवन की दिशा बदली हुई दिखाई देगी।

पर्यूषण या दसलक्षण पर्व का वास्तविक प्रश्न यह नहीं है की इन दिनों में दुनिया ने हमें कितना धार्मिक माना, बल्कि यह होना चाहिए की हमारी आत्मा ने हमारे भीतर कितना परिवर्तन अनुभव किया?

यदि हमारी तस्वीर चमक गई लेकिन चरित्र वैसा ही रहा, तो पर्व आया और चला गया। लेकिन यदि थोड़ी-सी कटुता कम हुई, थोड़ा-सा अहंकार झुका, कुछ अपव्यय रुका, किसी जीव के प्रति करुणा जागी और किसी मनुष्य को समानता का अनुभव हुआ—तो समझना चाहिए कि पर्यूषण कैलेंडर में ही नहीं, हमारे अंतःकरण में भी घटित हुआ है।

सादर,
विकास जैन ✍️