महावीर दर्शनपरम्परा से प्रज्ञा की ओर

युवा पीढ़ी से संवादविकास जैन

पर्युषण, जमीकंद और युवा पीढ़ी

पाप, पोषण और अहिंसा का वास्तविक प्रश्न अपने प्रत्येक उपभोग के पीछे छिपी हिंसा को पहचानो और जितना सम्भव हो, उसे कम करो।

पर्युषण महापर्व आरम्भ होने वाला है। इसके साथ ही अनेक जैन परिवारों की रसोई का स्वरूप भी बदलने लगेगा। आलू, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली और दूसरे जमीकंद रसोई से बाहर हो जाएँगे। जिन घरों में वर्षभर इनका प्रयोग होता है, वहाँ भी पर्युषण के दिनों में पुरानी पीढ़ी इनके पूर्ण त्याग का आग्रह करेगी।

आधुनिक शिक्षा और विज्ञान की भाषा में सोचने वाली युवा पीढ़ी स्वाभाविक रूप से पूछती है— जब विज्ञान आलू, प्याज और लहसुन के स्वास्थ्य-लाभ बताता है, तब धर्म इन्हें खाने से क्यों रोकता है?

यह प्रश्न धर्म-विरोधी नहीं है। बल्कि धर्म को समझकर स्वीकार करने की दिशा में उठाया गया एक ईमानदार प्रश्न है। लेकिन इसका उत्तर केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि “पाप लगेगा”, “अनन्त जीव मरेंगे” अथवा “इन्हें नहीं खाने से बुद्धि तेज होती है।”

आज के युवाओं से संवाद करते समय न तो धर्म को विज्ञान बनाकर प्रस्तुत करना उचित है और न विज्ञान के नाम पर अप्रमाणित दावे करना। हमें ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद और जैन दर्शन—तीनों भोजन को अलग-अलग कसौटियों पर देखते हैं।

विज्ञान पूछता है—इस भोजन से शरीर को क्या मिलेगा?

आयुर्वेद पूछता है—यह किस व्यक्ति, प्रकृति, मात्रा और परिस्थिति में हितकारी होगा?

जैन दर्शन पूछता है—यह भोजन प्राप्त करने में कितनी हिंसा हुई और क्या उससे बचने का कोई विकल्प उपलब्ध था?

यहीं से जमीकंद के त्याग की वास्तविक अवधारणा समझ में आती है।

जैन धर्म का आधार : अनन्तकाय और न्यूनतम हिंसा

तत्त्वार्थसूत्र वनस्पति को एकेन्द्रिय स्थावर जीव मानता है। जैन जीव-विज्ञान वनस्पति को मुख्यतः दो रूपों में समझाता है—प्रत्येक-शरीरी वनस्पति, जिसमें एक शरीर एक जीव का आश्रय माना गया है; और साधारण-शरीरी अथवा अनन्तकाय वनस्पति, जिसमें एक सामान्य शरीर असंख्य जीवों का आश्रय माना गया है।

जैन परंपरा में अनेक कंद, मूल, अंकुर तथा समान प्रकृति वाली वनस्पतियों को अनन्तकाय की श्रेणी में रखा गया है। उनके कटे हुए भागों से पुनः अंकुर उत्पन्न होने जैसी विशेषताओं को इसकी पारंपरिक पहचान के संकेतों में गिना गया है।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। अनन्तकाय का अर्थ केवल यह नहीं है कि आलू अथवा प्याज पर बहुत सारे बैक्टीरिया लगे हुए हैं। आधुनिक सूक्ष्मजीव-विज्ञान में पाए जाने वाले बैक्टीरिया, फफूँद और वनस्पति-कोशिकाओं को सीधे जैन दर्शन के “जीव”, “आत्मा” अथवा “निगोद” के समान मान लेना उचित नहीं होगा। अनन्तकाय जैन दर्शन की आध्यात्मिक जीव-श्रेणी है; वह आधुनिक सूक्ष्मदर्शी से सिद्ध किया जाने वाला वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है।

जमीकंद के त्याग के पीछे हिंसा के मुख्यतः तीन स्तर समझे गए हैं।

  • पहला—जिस वनस्पति को अनन्तकाय माना गया है, उसके एक भाग को नष्ट करने में अनेक जीवों की हिंसा मानी जाती है।
  • दूसरा—आलू, गाजर अथवा मूली निकालते समय सामान्यतः पूरा पौधा उखाड़ दिया जाता है। इसके विपरीत अनेक फल तोड़ने पर उनका मूल पौधा तत्काल नष्ट नहीं होता।
  • तीसरा—भूमि खोदने और मिट्टी को उलटने से उसमें रहने वाले कीटों, कृमियों और दूसरे सूक्ष्म जीवों को अतिरिक्त हानि होने की संभावना रहती है।

पूरा पौधा उखड़ना और मिट्टी का विचलित होना प्रत्यक्ष तथ्य हैं। इनसे जैन अहिंसा की संवेदनशीलता समझी जा सकती है। लेकिन यह कहना कि प्रत्येक जड़ वाली फसल पर्यावरण की दृष्टि से प्रत्येक फल, दाल अथवा अनाज से हमेशा अधिक विनाशकारी होती है—वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है।

खेती की कुल हिंसा और पर्यावरणीय प्रभाव फसल, भूमि, पानी, कीटनाशकों, उत्पादन-विधि और प्रति एकड़ उपज जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करते हैं। अनाज, दाल और मूँगफली की खेती में भी पौधे काटे अथवा उखाड़े जाते हैं। इसलिए जैन आहार-मर्यादा को आधुनिक कृषि का सम्पूर्ण पर्यावरणीय आकलन बताने के बजाय अहिंसा के लिए बनाई गई एक व्यावहारिक आध्यात्मिक सीमा के रूप में समझना अधिक उचित है।

जैन दर्शन का यह दावा नहीं है कि भोजन करते हुए हिंसा को पूर्णतः शून्य किया जा सकता है। उसका प्रयास है—“जीवन-निर्वाह करते हुए परिहार्य हिंसा को यथासंभव कम किया जाए।”

विज्ञान इन पदार्थों के विषय में क्या कहता है?

यह स्वीकार करने में धर्म को कोई भय नहीं होना चाहिए कि इनमें से अनेक पदार्थ पौष्टिक हैं।

आलू कार्बोहाइड्रेट, पोटैशियम और कुछ विटामिन प्रदान करता है। उबला हुआ अथवा कम तेल में बना आलू संतुलित भोजन का हिस्सा हो सकता है। समस्या प्रायः आलू से अधिक उसकी मात्रा, तली हुई अवस्था तथा उसके साथ प्रयुक्त नमक और तेल में होती है।

प्याज और लहसुन में सल्फर-युक्त जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। उपलब्ध शोध के अनुसार लहसुन के कुछ उत्पाद उच्च रक्तचाप, LDL कोलेस्ट्रॉल और रक्त-शर्करा में मामूली लाभ पहुँचा सकते हैं। लेकिन वे चिकित्सक द्वारा निर्धारित औषधि के विकल्प नहीं हैं। अधिक मात्रा अथवा सप्लीमेंट के रूप में लेने पर रक्तस्राव का जोखिम बढ़ सकता है। प्याज और लहसुन कुछ IBS रोगियों में गैस और पेट की परेशानी भी उत्पन्न कर सकते हैं।

मूँगफली प्रोटीन, असंतृप्त वसा और अनेक पोषक तत्त्वों का अच्छा स्रोत है। लेकिन उससे गंभीर एलर्जी हो सकती है और अनुचित भंडारण में अफ्लाटॉक्सिन का खतरा रहता है। यह भी समझना चाहिए कि वनस्पति-विज्ञान की दृष्टि से मूँगफली जड़ अथवा कंद नहीं, बल्कि भूमिगत विकसित होने वाली फली का बीज है। इसीलिए कुछ जैन परंपराएँ सूखी मूँगफली को स्वीकार करती हैं, जबकि कुछ स्थानीय मर्यादाएँ उसका भी त्याग करती हैं।

अतः आधुनिक विज्ञान यह नहीं कहता कि ये सभी पदार्थ हर व्यक्ति के लिए केवल लाभकारी ही हैं। वह लाभ के साथ मात्रा, बनाने की विधि, स्वास्थ्य-स्थिति और संभावित हानि को भी देखता है।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात है—पौष्टिक होना और अनिवार्य होना दो अलग बातें हैं।

आलू, प्याज और लहसुन में मिलने वाले पोषक तत्त्व दालों, अनाज, मिलेट, सोया, तिल, मेवों, कच्चे केले, फलों तथा दूसरी जैन-अनुकूल सब्जियों से प्राप्त किए जा सकते हैं। सुव्यवस्थित जैन भोजन में जमीकंद का त्याग अपने-आप किसी विशेष पोषण-कमी का कारण नहीं बनता।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण

आयुर्वेद प्याज और लहसुन को विषाक्त अथवा सर्वथा अनुपयोगी नहीं मानता। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इनके औषधीय गुणों के साथ उनकी उष्णता, तीक्ष्णता, गुरुता और दोषों पर प्रभाव का भी वर्णन मिलता है।

अर्थात आयुर्वेद इन्हें प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन आवश्यक भोजन नहीं बताता। वह पूछता है—व्यक्ति की प्रकृति क्या है, उसकी पाचन-अग्नि कैसी है, ऋतु कौन-सी है, मात्रा कितनी है और पदार्थ का प्रयोग भोजन के रूप में हो रहा है अथवा औषधि के रूप में?

किसी पदार्थ का औषधीय होना उसके दैनिक सेवन को अनिवार्य नहीं बनाता। उसी प्रकार उसका औषधीय होना जैन साधक के स्वैच्छिक त्याग को भी गलत सिद्ध नहीं करता। प्याज-लहसुन को केवल “तामसिक होने के कारण जैन धर्म में निषिद्ध” बताना भी अधूरा है। सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भोजन की भाषा मुख्यतः दूसरी योगिक एवं भारतीय आहार-परंपराओं से जुड़ी है। जैन धर्म में इनके त्याग का मूल आधार अनन्तकाय, अहिंसा और संयम है। यह कहना भी वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं कि सामान्य मात्रा में प्याज-लहसुन खाने से सीधे क्रोध, कामेच्छा अथवा मानसिक अशांति बढ़ जाती है। ऐसे प्रभावों को किसी साधना-परंपरा या व्यक्तिगत अनुभव के रूप में बताया जा सकता है, लेकिन आधुनिक स्नायु-विज्ञान का प्रमाण कहकर प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

यदि ये उपयोगी हैं तो फिर इनका त्याग क्यों?

यही इस विषय का सबसे सुंदर दार्शनिक पक्ष है। यदि आलू, प्याज और लहसुन केवल विषैले तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते, तो उनका त्याग धर्म नहीं, मात्र स्वास्थ्य-सावधानी कहलाता।

व्रत और संयम का वास्तविक अर्थ ही है—किसी उपयोगी, स्वादिष्ट अथवा प्रिय वस्तु पर किसी उच्चतर मूल्य के लिए स्वेच्छा से मर्यादा लगाना। विज्ञान द्वारा इन पदार्थों के लाभ बताए जाने से जैन त्याग निरर्थक नहीं हो जाता। बल्कि इससे स्पष्ट होता है कि जैन साधक इन्हें अज्ञानवश नहीं, बल्कि अहिंसा और आत्मसंयम को अधिक महत्व देने के कारण छोड़ता है।

जमीकंद स्वयं कोई पापमय पदार्थ नहीं है; उसके उत्पादन, संग्रह और सेवन में मानी गई अधिक तथा परिहार्य जीव-हिंसा पापबंध का कारण मानी जाती है।

पर्युषण में ही अधिक कठोरता क्यों?

पर्युषण आते ही जमीकंद अचानक अधिक हिंसक नहीं हो जाता। परिवर्तन पदार्थ में नहीं, साधक की जागरूकता में आता है। पर्युषण आत्मा के समीप लौटने, प्रमाद घटाने और संयम बढ़ाने का विशेष अवसर है। पूरे वर्ष जितना त्याग सम्भव नहीं हो पाया, इन दिनों व्यक्ति अपनी सुविधा और स्वाद को सीमित करके अपनी संवेदनशीलता को अधिक गहरा करता है।

इसलिए पर्युषण का संदेश केवल यह नहीं है— “आलू-प्याज मत खाओ।”

उसका वास्तविक संदेश है—“अपने प्रत्येक उपभोग के पीछे छिपी हिंसा को पहचानो और जितना सम्भव हो, उसे कम करो।”

युवा पीढ़ी से हमें पूरी ईमानदारी से कहना चाहिए— हाँ, आलू, प्याज और लहसुन में पोषक तथा औषधीय गुण हो सकते हैं। फिर भी जैन साधक इनका त्याग कर सकता है, क्योंकि मनुष्य केवल शरीर की आवश्यकताओं से नहीं, अपने नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से भी जीवन जीता है।

आज की युवा पीढ़ी को परंपरा ढोने के लिए नहीं, उसके भीतर छिपी संवेदना समझने के लिए आमंत्रित कीजिए। उसे गलत विज्ञान अथवा भय से प्रभावित करने के बजाय सत्य से परिचित कराइए— विज्ञान यह बताता है कि भोजन से हमें क्या मिला; अहिंसा यह पूछती है कि उसे प्राप्त करने में किसी दूसरे जीवन को क्या मूल्य चुकाना पड़ा।

और शायद पर्युषण का अर्थ भी यही है— अपनी थाली को थोड़ा सीमित करके अपनी चेतना को थोड़ा और विस्तृत कर लेना।

विकास जैन✍️