अंग्रेज चले गए। हमारे भीतर का दरबार कब जाएगा?
जहाँ विवेक गिरवी है, वहाँ दरबार जीवित है।
प्राचीन सूत्रों को आधुनिक जीवन की कसौटी पर परखने की एक कोशिश।
जहाँ विवेक गिरवी है, वहाँ दरबार जीवित है।
जीवन की सार्थकता केवल श्रेष्ठ पाने में नहीं, श्रेष्ठ करने और श्रेष्ठ होने में है।
सच्चे गुरु के प्रति हमारी श्रद्धा की सार्थक परिणति यही है कि हम केवल अनुयायी बने रहने से आगे बढ़ें और जागरूक, उत्तरदायी तथा आत्मनिर्भर श्रावक बनें।
यदि शब्दों ने क्षमा माँग ली, किंतु अहंकार ने अपनी गलती स्वीकार नहीं की; यदि हमने सबको “मिच्छामि दुक्कडम्” कहा, लेकिन किसी एक व्यक्ति का नाम आते ही भीतर क्रोध जाग उठा—तो क्षमापना अभी हमारे व्यवहार तक पहुँची है, चेतना तक नहीं।
जिंदगी के रंगमंच पर हर व्यक्ति को एक किरदार निभाना पड़ता है, लेकिन सबसे मुश्किल भूमिका उस व्यक्ति की होती है जिसे समाज ‘जिम्मेदार' कहता है।
‘त्याग और संघर्ष के आराध्यों से सुख और ऐश्वर्य की अपेक्षा—हमारी आस्था का अंतर्विरोध।’
समभाव से सम्यक दृष्टि तक
जैन दर्शन में मांसाहार, जमीकंद और उपवास का समग्र चिंतन - अहिंसा, स्वास्थ्य, पाप–पुण्य और आयुर्वेद के आलोक में
महावीर को भगवान मानना हमारी श्रद्धा है। महावीर ने जो मार्ग दिखाया, उसका एक कदम अपने जीवन में उतारना हमारा पुरुषार्थ है। जब धर्म की क्रिया हमें यह कदम उठाने में सहायता देती है, तब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई देने लगता है।
देवपूजा गुरूपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः। दानं चेति गृहस्थानां षट्कर्माणि दिने दिने॥
कषाय घटें, करुणा बढ़े
बंधन से मुक्ति और दृष्टि का विस्तार
आत्मविजय से मोक्षमार्ग तक
जिन के गुणों को नमन करने के साथ उन्हें अपने आचरण में उतारने का प्रयास ही मेरे लिए जैन धर्म का जीवंत अर्थ है।
मेरे निर्णय मैं ले रहा हूँ, या मेरी आदतें और प्रतिक्रियाएँ?
जब लोग हमें नाम से पहले हमारे व्यवहार में अहिंसा और सत्य को पहचानने लगें, तब चातुर्मास का संदेश प्रवचन स्थल से निकलकर समाज तक पहुँचेगा।
धोवन और उबले हुए जल का उपयोग, नवकारसी, पोरसी, एकासन, बियासन, आयंबिल और उपवास। इन क्रियाओं को करते हुए कभी ठहरकर यह भी पूछना चाहिए: इनसे मेरे भीतर क्या बदल रहा है?
जब ‘णमो’ होंठों से उतरकर आचरण में पहुँचता है, तभी नमस्कार आत्मजागरण बनता है।
जैनागम में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं साधु यानी मुनि रूप पाँच परमेष्ठी ही आराध्य माने गए हैं। इनके आद्य अक्षरों को परस्पर मिलाने पर ‘ओम्’/‘ओं’ बन जाता है।
जैन धर्म में पाँच पदों को सबसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इन्हें पंचपरमेष्ठी कहते हैं, ध्वज के पाँच रंग 'पंचपरमेष्ठी' के प्रतीक है।
जैन प्रतीक चिह्न जीव की संसारी अवस्था से लेकर रत्नत्रय की साधना और मोक्ष तक की यात्रा को एक रूप में प्रस्तुत करता है।
पाप, पोषण और अहिंसा का वास्तविक प्रश्न अपने प्रत्येक उपभोग के पीछे छिपी हिंसा को पहचानो और जितना सम्भव हो, उसे कम करो।
आगम की दृष्टि से पर्युषण का वास्तविक अर्थ—वर्षावास से आत्मसंयम, अहिंसा, प्रतिक्रमण और क्षमा तक यह भोजन से प्रारम्भ हो सकता है, लेकिन भोजन पर समाप्त नहीं होता। यह शरीर को अनुशासित करता है, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य चेतना को अनुशासित करना है।
साधु का मार्ग महाव्रत का है; गृहस्थ का मार्ग अणुव्रत, मर्यादा और क्रमिक पुरुषार्थ का।
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति, संस्था, संघ अथवा आयोजन के विरुद्ध नहीं है। यह हम सबके लिए आत्मनिरीक्षण का प्रश्न है, क्योंकि धर्म की साख केवल विरोधियों के कारण नहीं गिरती; कई बार वह उसके अनुयायियों के आचरण और धर्म के नाम पर खड़ी की गई हमारी प्राथमिकताओं के कारण भी क्षीण होती है।
वर्धमान महावीर केवल एक तीर्थंकर के रूप में पूजनीय प्रतिमा नहीं हैं, बल्कि वे एक वैज्ञानिक, कुशल प्रबंधक और महान लोकतांत्रिक विचारक के रूप में आज की हर समस्या का 'सम्पूर्ण समाधान' हैं।
यदि शब्दों ने क्षमा माँग ली, किंतु अहंकार ने अपनी गलती स्वीकार नहीं की; यदि हमने सबको “मिच्छामि दुक्कडम्” या "उत्तम क्षमा" कहा, लेकिन किसी एक व्यक्ति का नाम आते ही भीतर क्रोध जाग उठा—तो क्षमापना अभी हमारे व्यवहार तक पहुँची है, चेतना तक नहीं।
महावीर दर्शन महज एक वेबसाइट नहीं है; यह जैन दर्शन के उस मौलिक और वैज्ञानिक स्वरूप को खोजने का संकल्प है, जो सदियों के आडंबरों के नीचे दब गया है।
वर्तमान पीढ़ी तर्क चाहती है, प्रमाण चाहती है और सबसे महत्वपूर्ण—उपयोगिता चाहती है। हम महावीर को पूजते तो हैं, लेकिन उन्हें समझते कितना हैं?
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